संतो के संग से ही जीवन में परिवर्तन संभव है :- साध्वी राधिका भारती। 

रिपोर्टर – संजय पुरी, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्वारा, शिवरात्रि महोत्सव को समर्पित पंगोतरा दाती माता मंदिर, मामून में पांच दिवसीय “भगवान शिव कथा” का विशेष आयोजन किया गया। जिसके प्रथम दिवस में सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी राधिका भारती जी ने बताया कि भगवान शिव की कथा मानव जाति को सुख समृ‌द्धि व आनंद देने वाली है। क्योंकि भगवान शिव कल्याण एवं सुख के मूल स्त्रोत हैं। वे सम्पूर्ण विद्यायों के ईश्वरब्रह्मवेद के अधिपति तथा साक्षात परमात्मा हैं। भगवान भोले नाथ की कथा में गोता लगाने से मानव को प्रभु की प्राप्ति होती है। लेकिन कथा को सुनने और उसमें उतरने में अंतर होता है। सुनना तो सहज है लेकिन इसमें उतरने की कला हमें केवल एक पूर्ण संत सिखा सकता है कथा के प्रथम दिवस महात्म्य का वर्णन करते हुए साध्वी जी ने कहा कि चंचुला नाम की एक स्त्री थी जो बहुत दुराचारिणी थी। लेकिन जब उसे एक पूर्ण संत का संग मिला तो वह शिव धाम की अनुगामिणी बनी। हमारे समस्त वेद-शास्त्र सत्संग की महिमा का व्याख्यान अनेकों प्रकार से करते हैं। एक घड़ी के सत्संग की तुलना स्वर्ग की समस्त संपदा से की गई है। संत की कृपा से लंकिनी के जीवन में परिवर्तन हो गया। संत के चरणों का प्रताप ही ऐसा होता है जिससे मानव के मरुस्थल जीवन में बहार आ जाती है मानव का नीरस जीवन सरस बन जाता है एवं विकारों से भरा मानव का हृदय ईश्वरीय भक्ति से भर जाता है। संतों के संग से एक भक्त सहज ही भवसागर से पार हो जाता है। परन्तु वास्तव में सत्संग कहते किसे हैं सत्संग दो शब्दों के मेल से मिलकर बना है-सत्य और संग। सत्य यानि परमात्मा और संग अर्थात् मिलन और परमात्मा से मिलन के लिए केवल एक पूर्ण संत ही मध्यस्थ का कार्य करता है। इसलिए हमें जीवन में एक पूर्ण संत की खोज में अग्रसर होना चाहिए जो हमारा मिलाप परमात्मा से करवा दे। उन्होंने बताया कि भगवान शिव ने लोक कल्याण के लिए हलाहल विष का पान किया और संपूर्ण मानव जाति के सामने एक संदेश रखाएकि यदि हम महान बनना चाहते हैंएतो हमें त्याग की भावना से पोषित होना पड़ेगा। समाज की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज प्रत्येक मनुष्य का अंतःकरण अज्ञानता के तम से आच्छादित है। जब-जब मानव के भीतर अज्ञानता व्याप्त होती है तब-तब मानव समाज मानवता से रिक्त हो जाता है और उनमें मानवीय गुणों का ह्रास होने लगता है। समाज में अधर्म अत्याचार अनाचारए भ्रष्टाचारए व्यभिचार आदि कुरीतियां अपना सिर उठाने लगती हैं। यही कारण हैएकि हमारे ऋषि-मुनियों ने उस परम तत्व के समक्ष प्रार्थना की हैएकि हे! प्रभु हमारे भीतर के अंधकार को दूर कीजिए ताकि ज्ञान का प्रकाश पाकर हम अपने जीवन को सुन्दर बना सकें। क्योंकि जब तक मानव अज्ञानता के गहन अंधकार से त्रस्त रहेगा तब तक उसका सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। जिस प्रकार बाहर के प्रकाश से बाहर का अंधकार दूर होता है उसी प्रकार आंतरिक जान प्रकाश से आंतरिक अजान तमस नष्ट होता है। आंतरिक तमस के नाश के लिए जान के प्रकाश को प्राप्त करना होगा और ज्ञान की प्राप्ति किसी पूर्ण गुरु की शरण में जाकर ही होगी जो मानव के भीतर उस ईश्वरीय प्रकाश को प्रकट कर देते हैं। यही कारण है कि जब भी शास्त्रों में इस जान प्रकाश के लिए प्रेरित किया तो उस ज्ञान की प्राप्ति हेतु पूर्ण गुरु के सानिध्य में जाने का उपदेश दिया। इसी अवसर पर साध्वी सदया भारती, साध्वी नवप्रीत भारती, साध्वी यशा भारती, साध्वी प्रभुज्योति भारती, ने सुमधुर भजनों का गुणगान किया प्रथम दिवस की सभा में स्वामी हरीशानंद स्वामी जगदीशनंद, रजिंदर सिंह पठानिया, रकेश शर्मा, डॉक्टर फकीरचंद डोगरा, विपिन शर्मा, अमित जमवाल बॉबी, चंद्रशेखर, करनैल सिंह, युद्धवीर सिंह, कस्तूरी लाल, मास्टर सुरेंद्र सिंह ठाकुर,
क्षेत्र के भारी संख्या में गणमान्य श्रद्धालु उपस्थित रहे, कार्यक्रम का समापन प्रभु की मंगल आरती के साथ किया गया , स्वामी हरिशानंद जी ने उपस्थित प्रभु भक्तों से कहा आप सपरिवार आगामी दिनों में कथा में अवश्य पहुंचे और भगवान भोलेनाथ जी की कृपा के पात्र बने।

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