रिपोर्टर:- अनुज, फतेहपुर, यूपी:- दशहरे पर रावण दहन नहीं, बल्कि रावण वध की लीला है खास पहचान — काष्ठ और तिरनई से तैयार होते हैं अनूठे चलायमान स्वरूप जनपद फतेहपुर के ऐतिहासिक खजुहा कस्बे में विजयादशमी के पावन पर्व पर 561 वर्ष से अधिक पुरानी ऐतिहासिक रामलीला का शुभारंभ हो गया। अपनी अनूठी परंपराओं और विशिष्ट मंचन शैली के लिए पहचान रखने वाली खजुहा की रामलीला आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं खजुहा की ऐतिहासिक रामलीला में रावण वध की लीला का मंचन विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। गणेश पूजन के साथ शुरू होने वाली यह रामलीला दस दिनों तक चलेगी। आयोजन के क्रम में राम वन गमन लीला का मंचन किया जाएगा, जिसे देखने के लिए श्रद्धालुओं और रामभक्तों में उत्साह है। खजुहा की रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यहां तैयार किए जाने वाले पारंपरिक चलायमान स्वरूप हैं। इन्हें काष्ठ और तिरनई से बनाया जाता है। स्थानीय स्तर पर इन स्वरूपों को रामलीला की विशिष्ट पहचान माना जाता है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। निजामी पेंटर के रंगों में झलकती है हिंदू-मुस्लिम एकता इस ऐतिहासिक आयोजन की एक और खास बात सामाजिक सौहार्द की मिसाल है। रामलीला में इस्तेमाल होने वाले पुतलों का रंग-रोगन नूर मोहम्मद उर्फ निजामी पेंटर करते हैं। उनकी कला इस बात का संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति की असली ताकत आपसी भाईचारे और साझा विरासत में निहित है। खजुहा की इस रामलीला में धर्म और आस्था के साथ कला तथा सामाजिक एकता का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यहांu की परंपरा यह संदेश देती है कि सांस्कृतिक आयोजन समाज को जोड़ने और आपसी सद्भाव को मजबूत करने का माध्यम भी हैं। मीडिया टीम से बातचीत में निजामी पेंटर ने रामलीला से जुड़े अपने अनुभव और इस ऐतिहासिक परंपरा के बारे में क्या कुछ बताया, आइए सुनते हैं।






