अन्नपूर्णा के देश में आज भी अधूरी है पोषण की थाली, तीन में एक बच्चा उम्र के हिसाब से कम वजन का।

रिपोर्टर – सुरेंद्र कुमार पंवार, जोधपुर, राजस्थान :- भारत को अन्नपूर्णा और कृषि प्रधान देश कहा जाता है, लेकिन देश में बच्चों के पोषण की स्थिति अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। पोषण सप्ताह के अवसर पर सामने आई एक रिपोर्ट में बच्चों के कम वजन और महिलाओं में एनीमिया जैसी समस्याओं को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों के पोषण का आकलन केवल उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी लंबाई और वजन के अनुपात को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। सरकार का पोषण अभियान भी बच्चों में बौनापन, कम वजन, एनीमिया और जन्म के समय कम वजन जैसी समस्याओं को कम करने पर केंद्रित है। बच्चे का विकास सामान्य है या नहीं, यह पता लगाने के लिए उसकी उम्र के साथ लंबाई और वजन की नियमित निगरानी महत्वपूर्ण मानी जाती है। पोषण संबंधी मूल्यांकन में लंबाई के अनुसार वजन जैसे मानकों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे कम वजन अथवा गंभीर कुपोषण की पहचान समय रहते की जा सके। इसी दिशा में रिपोर्ट में 2 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए नए पोषण मानकों का उल्लेख किया गया है। इसका उद्देश्य बच्चों के शारीरिक विकास की बेहतर निगरानी और पोषण संबंधी समस्या की शुरुआती पहचान करना है। रिपोर्ट में एक ऐसी पोषण थाली का उदाहरण भी दिया गया है, जिसकी अनुमानित लागत करीब 50 रुपये बताई गई है। इसमें अलग-अलग खाद्य पदार्थों को शामिल कर संतुलित भोजन तैयार करने पर जोर दिया गया है। इस थाली में प्रमुख रूप से -: मसूर/चना – 50 ग्राम, गुड़ और नींबू, नमक-मसाला, बाजरे की दो छोटी रोटियां – करीब 100 ग्राम, मौसमी हरी सब्जी – 200 ग्राम, आलू-टमाटर-प्याज की सब्जी – 100 ग्राम, छाछ – 100 ग्राम, सरसों/सोया तेल – 10 मिलीलीटर जैसे खाद्य पदार्थ शामिल किए गए हैं। इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि पोषणयुक्त भोजन के लिए महंगे खाद्य पदार्थ ही जरूरी नहीं, बल्कि स्थानीय और आसानी से उपलब्ध अनाज, दाल, सब्जियां और दुग्ध उत्पादों से भी संतुलित थाली तैयार की जा सकती है। गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान के आंकड़ों की तुलना की गई है। इसमें बच्चों के पोषण, महिलाओं एवं किशोरियों में एनीमिया और आंगनवाड़ी केंद्रों से जुड़े आंकड़े दिए गए हैं। प्रकाशित आंकड़ों में राजस्थान में बच्चों के कम वजन से जुड़ी स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक दिखाई गई है। रिपोर्ट में राजस्थान के लिए करीब 44.3 प्रतिशत, मध्य प्रदेश के लिए 33 प्रतिशत और गुजरात के लिए 13.51 प्रतिशत का आंकड़ा दर्शाया गया है। महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया के आंकड़े भी पोषण की समस्या को केवल बच्चों तक सीमित नहीं रखते। इसका सीधा संबंध परिवार और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य से भी है।

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