रिपोर्टर – नजीर मुलाणी, वसई (पालघर), महाराष्ट्र :- मशहूर इस्लामी विद्वान मुफ्ती सिराज अहमद कादरी मिस्बाही (मुंबई) ने समाज में बेटियों, बहनों और फूफियों को उनके शरई हक़-ए-विरासत से महरूम किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि विरासत में महिलाओं का हिस्सा अल्लाह तआला द्वारा मुक़र्रर किया गया हक़ है, जिसे कोई व्यक्ति, परिवार या समाज अपनी मर्ज़ी से समाप्त नहीं कर सकता। मुफ्ती कादरी ने कहा कि कई परिवारों में बेटियों को यह कहकर विरासत से वंचित कर दिया जाता है कि उनकी शादी पर अधिक खर्च किया गया था या उन्हें जेवर और अन्य सामान दिया गया था। इसी तरह बहनों और फूफियों को भी विभिन्न बहानों से उनके हिस्से से दूर रखा जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शादी में किया गया खर्च या दिया गया सामान विरासत का विकल्प नहीं हो सकता। उन्होंने कुरआन शरीफ की सूरह निसा की आयतों का हवाला देते हुए बताया कि अल्लाह तआला ने पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए विरासत में निश्चित हिस्सा निर्धारित किया है। इस हक़ को छीनना न केवल शरीयत की अवहेलना है बल्कि एक बड़ा सामाजिक अन्याय भी है। मुफ्ती कादरी ने कहा कि विरासत के मामलों में कई बार बहनों पर भावनात्मक दबाव डालकर या रिश्ते तोड़ने की धमकी देकर उनका हक़ छीना जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया की अदालत से बचा जा सकता है, लेकिन अल्लाह की अदालत में हर इंसान को अपने कर्मों का जवाब देना होगा। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपनी जिंदगी में ही औलाद को शरीयत के मुताबिक विरासत के नियमों की शिक्षा दें और यह सुनिश्चित करें कि उनके निधन के बाद सभी वारिसों को उनका निर्धारित हिस्सा मिले। उन्होंने कहा कि इंसाफ़ के साथ जायदाद का बंटवारा करने से बरकत पैदा होती है, जबकि हक़ मारकर जमा किया गया माल दुनिया और आख़िरत दोनों में नुकसान का कारण बन सकता है। अंत में मुफ्ती सिराज अहमद कादरी ने समाज से बेटियों, बहनों और फूफियों के हक़ की हिफाज़त करने तथा इंसाफ़ और बराबरी के सिद्धांतों को अपनाने की अपील की।





