अवैध इमारतों के कारण विद्यार्थियों का भविष्य अंधकार में

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रिपोर्टर- नजीर मुलाणी,मुंबई ,महाराष्ट्र-संपूर्ण वसई तालुका में कई स्कूल,कॉलेज कार्यरत है जिनकी इमारत ही अवैध है, परंतु कार्यवायी कुछ भी नही। शिक्षा विभाग आखिर क्यों मौन की निद्रा में सोया हुआ है??? छात्रों का भविष्य/जान आखिर क्यों दांव पर लगाया जा रहा है?? एक स्कूल की मान्यता के लिए आवश्यक तय नियमावली का पालन किन- किन स्कूलों ने किया है???क्या ये पालघर शिक्षण विभाग सार्वजनिक करेगा या फिर इसी दैनिक अवस्था मे ही स्कूल संचालित होते रहेंगे। हमारे पिछले लेख में हमने शिक्षा का मौलिक अधिकार व जमीनी हकीकत की ढ़ेरसारि जानकारियां जुटाई थी परंतु जन-जागृति आखिर अब व कैसे आएगी ये एक प्रशन वाचक चिन्ह बना हुआ है ??? क्या पालघर शिक्षण विभाग इन सभी समस्यायों से निपटने के लिए तय मानकों पर काम करेगी या फिर सब राम भरोसे ही चलेगा…कई स्कूलों की इमारतों में दरार,पीने का स्वच्छ पानी नही,बरसात में छत से टपकता पानी,कई ऐसे भी स्कूल है की जिनकी मान्यता कहा से मिली और किसने दी पता नही इत्यादि। यहां शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है,कही किसी के पास कुछ पैसे आ गए कि वो स्कूल ही शुरू कर देता है। व्यवस्था सिर्फ कागजो पर ही होगी या फिर धरातल पर भी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाया जाएगा। चलो मान लेते है कि प्रशासनिक व्यवस्था में कमियां नही है तो फिर कमियां आखिर कहा है???कोई प्रशासनिक अधिकारी ये बतायेगा…हम तो इस विषय पर लड़ते रहेंगे चाहे जो भी हो जाये… सबका पर्दाफाश जरूर करेंगे शिक्षा का व्यवसायीकरण रोकने की कोशिश सदैव रहेगी इसमें चाहे हमारी जान ही क्यों न चली जाए परंतु व्यवस्था को बदलवाने का प्रयास करता रहूँगा।गत कुछ दिनों से हमनें कुछ स्कूलों के खिलाफ आवाज उठाई है। संबंधित सभी विभागों को पत्र व ईमेल द्वारा अवगत भी कराया है परंतु कार्यवायी कब होगी ये भी अभी तक प्रशन ही बना हुआ है।
आइये हम एक बार फिर से शिक्षा का मौलिक अधिकार व जमीनी हकीकत की ढ़ेरसारि जानकारियां जुटाते है…शिक्षा किसी भी व्यक्ति एव समाज के समग्र विकास ले लिए आधारभूत मानव मौलिक अधिकार है और बच्चे देश का भविष्य है। ऐसे में उन्हें पूर्ण रूप से शिक्षित करना उनके माता पिता का ही नहीं बल्कि सरकार का भी कर्तव्य है। करीब १३५ देशो ने अपने सविधान में शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है तथा मुफ़्त एव भेदभाव रहित शिक्षा सभी को देने का प्रावधान भी किया है।भारत ने भी १९५० में १४ वर्ष तक के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देने का प्रावधान सविधान में दिया है ,परंतु इसे कितने विद्यालय मानते है ये एक प्रश्न चिन्ह बना हुआ है।
शिक्षा हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार… १२ दिसंबर २००२ को सविधान में ८६ वां संशोधन किया गया और इसके अनुच्छेद २१अ को संशोधित करके शिक्षा को मौलिक अधिकार के तौर पर लागू किया गया है,हालांकि बच्चों के लिए मुफ़्त एव अनिवार्य शिक्षा का अधिनियम १अप्रैल  2010 को पूर्ण रूप से लागू हुआ। अगर ६ वर्ष से अधिक उम्र का बच्चा किसी कारणवश स्कूल नहीं जा पाता है तो उसे शिक्षा के लिए उसकी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में प्रवेश दिलवाया जाएगा।यदि किसी क्षेत्र में विद्यालय नहीं है तो वहा पर ३ वर्षो की तय अवधी में विद्यालय का निर्माण करवाया जाना आवश्यक है।स्कूल न तो प्रवेश के लिए केपीटेसन फ़ीस और न ही किसी तरह का डोनेसन ले सकते है अगर वे ऐसा करते हुए पाये गए तो उन पर २५००० हजार रूपये जुर्माना लगेगा।ऐसा दोबारा करने पर ५०००० हजार रूपये जुर्माना हो जायेगा।शिक्षको के निजी ट्यूसन् पर पूरी तरह रोक होगी व किसी भी बच्चे को शारीरिक रूप से सजा नहीं दी जा सकती।स्कूल प्रबंधन समितियों के ७५% प्रतिशत सदस्य छात्रो की कार्यप्रणाली और अनुदानों के इस्लेमाल की देखरेख करेगी।प्रत्येक ३० बच्चों के लिए एक सुयोग्य शिक्षक स्कूल में मौजूद रहना चाहिये।स्कूलो को प्रत्येक ५ वर्षो में अपने शिक्षको को प्रशिक्षित करना होगा। स्कूल में खेल का मैदान, पुस्तकालय, पर्याप्त संख्या में अध्य्यन कक्ष, शौचालय,शारीरिक दिव्यांक बच्चों के लिए निर्बाध्य पहुच पेय जल और दोपहर भोजन आदि की सुविधाये होनी चाहिये।गैर सरकारी स्कूल( निजी स्कूल) को भी २५% प्रतिशत सीटे गरीब वर्ग के बच्चों को मुफ़्त में मुहैया करानी होगी।ऐसा नहीं करने पर उनकी मान्यता रद्द कर दी जायेगी ऐसा प्रावधान है। किसी भी नजदीकी स्कूल में ६ से १४ वर्ष के बच्चो को प्रारंभिक शिक्षा मुफ़्त में प्राप्त करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।बच्चे के घर के नजदीक मौजूद स्कूल प्रवेश देने से इनकार नहीं कर सकता है।हर बच्चे की ८ वी तक की शिक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।दिव्यांक बच्चों की मुफ़्त शिक्षा की उम्र बढ़ाकर १८ वर्ष रखी गयी है। सिर्फ कानून बना देने से ही सरकारों की जिम्मेदारी पूर्ण नही हो जाती।ये कानून धरातल पर पूर्ण रूप से लागू है या फिर कानून सिर्फ कागजो पर ही सिमट सी गयी है इसकी भी निगरानी होनी चाहिए।महाराष्ट्र के पालघर जिले मे ऐसे अनगिनत स्कूल पाये जा सकते है जिनके पास बच्चो को देने के लिए शिक्षा ही नही बल्कि मूलभूत सुविधाएं भी नही है फिर भी ये स्कूल धड़ल्ले से बेखौफ होकर चलाये जा रहे है। बच्चो व अभिभावकों के भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है।कई स्कूलों की इमारत जर्जर अवस्था मे है तो कई इमारतों के स्ट्रक्चर ऑडिट कई वर्षो से नही की गयी है। वघरालपाढ़ा,राजवली,वसई स्थित जिला परिषद स्कूल के हाल ये है की बच्चे खुले मे पतरे की छत के नीचे बैठ बढ़ने को मजबूर है क्योंकि स्कूल के कमरे बुरी तरह से क्षति ग्रस्त है कभी भी कोई अप्रियघटना घट सकती है। स्कूलों व कॉलेजो को सिर्फ मान्यता देने या खोलने से बच्चो का भविष्य तय नही किया जा सकता इन्हें अच्छी शिक्षा व शिक्षा के दौरान सरकार को इन्हें मूलभूत सुविधाये भी उपलब्ध करानी होगी नही तो सर्व शिक्षा अभियान सिर्फ कागजो पर ही सिमट कर रह जायेगी। शिक्षण अधिकारी सिर्फ व सिर्फ कागजो पर ही शिक्षा को मजबूत करने मे व्यस्त प्रतीत होते जा रहे है। स्कूल प्रशासन भी बहुत चतुराई से शिक्षण अधिकारियों को चुना लगाने मे कामयाब हो रहा है।सरकार द्वारा बच्चो को दी जाने वाली सुविधाएं पूर्ण रूप से नही दी जा रही है। शिक्षा के क्षेत्र में घोर अनियमित्ताएं व्याप्त हैं, इन्हें दूर किया जाए, ताकि विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिले और अभिभावकों के जेब पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।तमाम निजी शिक्षण संस्थाएं विभिन्न प्रकार से फीस वसूल कर महाराष्ट्र शासन के नियमों की धज्जियां उड़ा रही हैं। शासकीय शिक्षण संस्थाओं में भी अव्यवस्थाओं की भरमार है।क्या कभी शिक्षण व्यवस्था मे सुधार हो पायेगा????

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