गोमूत्र से जलेंगे एलईड़ी बल्ब, देश के 2 छात्र दुनिया को देने जा रहे अनमोल तोहफा

नई दिल्ली/नगर संवाददाताः गोमूत्र के चिकित्सीय प्रयोग को लेकर देश मे शोध हो रहे हैं, जिसके कई सकारात्मक परिणाम भी सामने आएं हैं। वहीं, दिल्ली के एक निजी स्कूल के दो विद्यार्थी गोमूत्र के वैज्ञानिक महत्व पर काम कर रहे हैं, उन्होंने इससे बिजली बनाने का सफल मॉडल तैयार किया है। विद्यार्थियों का दावा है कि एक लीटर गोमूत्र से छह वोल्ट बिजली बनाई जा सकती है। एवरग्रीन सीनियर सेकेंडरी स्कूल में आयोजित सीबीएसई क्षेत्रीय विज्ञान प्रदर्शनी मे बुधवार को इंद्रप्रस्थ स्कूल के दो विद्यार्थी शिविका व विशेष ने यह मॉडल प्रदर्शित किया। विशेष का कहना है कि गोमूत्र मे यूरिक एसिड होता है, जिसके जरिये बिजली पैदा की जा सकती है। इससे एलईड़ी  बल्ब और ट्यूब लाइट तक जलाए जा सकते हैं। विशेष की मानें तो मॉडल में कॉपर के इलेक्ट्रोड का प्रयोग कर रहे हैं, जो गोमूत्र के संपर्क में आने पर प्रतिक्रिया करता है और बिजली उत्पन्न होती है। उधर, शिविका का कहना है कि डेयरी का व्यवसाय करने वाले लोगों को इसका काफी फायदा मिलेगा। दोनों विद्यार्थी गोमूत्र से जैविक खाद व कीटनाशक का उत्पादन भी कर चुके हैं। पूर्वी दिल्ली के वसुंधरा एंक्लेव स्थित एवरग्रीन सीनियर सेकेंडरी स्कूल में बुधवार से शुरू हुई तीन दिवसीय क्षेत्रीय विज्ञान प्रदर्शनी 2017-18 मे 100 स्कूलों के बच्चे भाग ले रहे हैं। उद्घाटन पूर्वी दिल्ली नगर निगम की मेयर नीमा भगत, सीबीएसई की संयुक्त सचिव डॉ. श्वेता सिंह, दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. बीसी सबाता ने किया। नीमा भगत ने जीवन मे शिक्षक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। स्कूल की प्रधानाचार्य प्रियंका गुलाटी ने बताया कि प्रदर्शनी में लगभग 163 मॉडल- शोध प्रदर्शित किए जाएंगे। इस उद्देश्य वैज्ञानिक शोध कार्यो के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना व लोगों को पर्यावरण के प्रति सजग करना है। विद्यार्थियो मे एक-दूसरे से सीखने की कला भी विकसित होगी। उन्होंने बताया कि सर्वश्रेष्ठ शोध व मॉडल राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए चयनित किए जाएंगे। चार साल पहले छत्तीसगढ़ अनोखा व बेहद उपयोगी प्रयोग किया गया था, जहां पर कामधेनू पंचगव्य एवं अनुसंधान संस्थान अंजोरा के डायरेक्टर डॉ. पीएल चौधरी ने बताया था कि बैटरी में 500 ग्राम गोमूत्र का उपयोग कर 400 घंटे तक 3 वॉट के एलईडी (लेड) बल्ब से रौशनी प्राप्त की जा सकती है। गोमूत्र से लालटेन के इस प्रयोग को नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ रायपुर ने भी प्रमाणित किया गया था। इस लालटेन में बैटरी के भीतर डाले जाने वाली एसिड की जगह गोमूत्र डाला गया। इसमें किसी भी प्रकार का कोई केमिकल नहीं मिलाया गया है, न ही बैटरी में कोई बदलाव किया गया है। खास बात यह है कि बैटरी सिर्फ देशी गाय के गोमूत्र से ही चलेगी। इसे मोटर साइकिल की पुराने बैटरी का उपयोग कर विकसित किया गया है। उन्होंने बताया कि लालटेन में जब बल्ब की रोशनी कम होने लगती है तो गोमूत्र को बदलना होता है।

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