सद्गुरु श्रेष्ठ मानवों के मूर्तिकार

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के दिल्ली स्थित दिव्य धाम आश्रम में मासिक आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य एवं शिष्याओं ने प्रेरणादायक सत्संग प्रवचनों एवं भावों से ओत प्रोत भजनों की श्रृंखला को श्रद्धालुओं के समक्ष रखा। कार्यक्रम में श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी जी ने संस्थान का परिचय देते हुए बताया कि दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान एक बहुआयामी सामाजिक एवं आध्यात्मिक संस्था है जिसके संस्थापक एवं संचालक गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी है। महाराज जी के दिशा निर्देशन में संस्थान आत्म जाग्रति (जागरण) द्वारा विश्व में शांति के लक्ष्य को लेकर पूरे विश्व में कार्यशील है। संस्थान विश्वस्तरीय व्याप्त अपनी अनेकानेक शाखाओं तथा बहुसंख्य निष्काम रूप से संलग्न कार्यकर्ताओं तथा समर्पित प्रचारकों के सहयोग से विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक गतिविधियों में पूर्ण निष्ठा के साथ कार्य कर रहा है। संस्थान की दिगदृष्टि है कि विश्व को साकार स्वरूप मिले जहाँ इसकी प्रत्येक इकाई (मानव) सनातन पुरातन विज्ञान ‘ब्रह्मज्ञान’ द्वारा सत्य, सद्भावना और पूर्ण न्याय की प्रतिमा बन जाए और जिनके प्रभाव से समस्त सामाजिक अपराध व आंतकवाद का अंत हो पाए। मानव का व्यक्तित्व निर्माण ही मानव इकाई का एकमात्र उद्देश्य है। वास्तव में आत्मज्ञान की शाश्वत पद्धति ब्रह्मज्ञान द्वारा ही मानवों में विवेक का जागरण होता है तथा यह ज्ञान ही जीव के कार्यव्यवहार व उसकी सोच को सही दिशा प्रदान करता है और जब एक शिष्य इस ज्ञान मार्ग का अनुसरण कर आगे पग बढ़ाता है तो व्यक्तिगत स्तर पर वैचारिक एवं व्यवहारिक परिवर्तन द्वारा मानव में सम्पूर्ण परिवर्तन आता है और यही परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन को साकार रूप प्रदान करता है।
श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी जी ने अपने प्रवचनों में बताया कि गुरु दरबार में श्रेष्ठ मानवों का निर्माण किया जाता है जो सम्पूर्ण समाज के लिए शांति, सद्भाव, आनंदमयी जीवन, सात्विक गुणों का उत्सर्जन करते है। एक आदर्श गुरु अपने शिष्यों के जीवन में आने वाले विकारों का हरण करते है और दुनिया के सामने ऐसी मूर्तियों को रखते है जो विश्व के लिए लाभदायक सिद्ध होती है और आज गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी भी ऐसे ही मानवों का निर्माण कर रहे है जो सामूहिक रूप से ध्यान – साधना द्वारा अपने अंतःकरण को पवित्र, विकाररहित बना रहे है तथा जन कल्याण हेतु निष्काम भाव से शुभ कार्य भी कर रहे है।

Share This Post

Post Comment