नेपाल को चीन से दूर रखने के लिए भारत की कूटनीतिक कोशिश तेज

नई दिल्ली/नगर संवाददाताः नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा विगत दिनों अपने पांच दिवसीय भारत के दौरे पर आए। महज डेढ़ बरस के मामूली से अंतराल में यह तीसरा मौका था जब दिल्ली ने नेपाली प्रधानमंत्री की मेजबानी की। इससे पहले फरवरी 2016 में नेपाल के प्रधानमंत्री के तौर पर केपी ओली और फिर सितंबर 2016 में पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ भी भारत की यात्र कर चुके हैं। वजह नेपाल में लंबे अर्से से जारी राजनीतिक अस्थिरता है। अलबत्ता नेपाल के प्रधानमंत्री देउबा के दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दीगर राजनेताओं से मुलाकातें जितनी सहज रहीं, उतनी शायद ही किसी और नेपाली प्रधानमंत्री की हालिया भारत यात्र में हुईं भेंट-वार्ताएं रही हों। कारण देउबा की पार्टी नेपाली कांग्रेस के साथ भारत का पारंपरिक संबंध है। इसीलिए जब इस साल के जून महीने में एक करार के तहत माओवादी नेता पुष्प कमल दहल ने सरकार में अपने सहयोगी दल नेपाली कांग्रेस को सत्ता स्थानांत्रित की तो भारत ने राहत की सांस ली कि चलो इससे बातचीत की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी। नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की भारत यात्र एक ऐसे समय में हुई है जब डोकलाम विवाद को लेकर भारत और चीन के मध्य जारी तनाव तीसरे महीने में प्रवेश कर गया है। अब भी दोनों देशों के बीच तनाव में कोई कमी नहीं नजर आ रही है। इन परिस्थितियों में ये भारत के लिए आवश्यक है कि वह काठमांडू को किसी भी हालत में बीजिंग से दूर रखे। माना जा रहा है कि इसी रणनीति के तहत नेपाल में आयोजित बिम्सटेक सम्मेलन के दौरान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से देउबा को भारत आने का न्यौता दिया था। ऐसे में नेपाल का प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्र के तौर पर देउबा के जरिए भारत का चयन करना काफी महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि शेर बहादुर देउबा की यात्र के दौरान भारत ने उनके स्वागत में ‘रेड कार्पेट’ बिछाया और पूरे गार्ड ऑफ ऑनर के साथ सम्मान-सत्कार किया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुई उनकी मुलाकात के दौरान न केवल दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को और प्रागाढ़ बनाने में सहमति जताई बल्कि आठ महत्वपूर्ण संधियों पर हस्ताक्षर हुए। इसमें रेल, सड़क और पनबिजली के साथ-साथ नेपाल के ढांचागत विकास की अहम संधिया शामिल हैं। भारत-नेपाल द्विपक्षीय वार्ता के दौरान दोनों देशों की सीमाओं को जोड़ने वाली जयानगर-बीजलपुर-बरदीबास और जोगबानी-बीरतनगर रेल लिंक योजनाओं को जल्द पूरा करने पर जोर दिया। इसके साथ ही बस सेवा पर ज्वाइंट वर्किग ग्रुप की बैठक आयोजित कर इसकी राह में आ रही बाधाओं को जल्द दूर करने पर जोर दिया गया। यही नहीं दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने सड़क निर्माण, बिजली परियोजनाओं, सिंचाई और विनाशकारी भूकंप के बाद पुनर्निर्माण के लिए दी गई कई मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन से खर्च होने वाली रकम और उससे होने वाले कार्यो पर भी संतोष जताया। कई विकास परियोजनाओं को लेकर चर्चा भी हुई। यहां सवाल ये उठता है कि क्या भारत और नेपाल के मध्य हुए हालिया समझौते, भारत की मदद से नेपाल में चलने वाली विकास योजनाओं और घोषणाओं से दोनों देश फिर से अपने सदियों पुराने रिश्ते की गाथा को दोहरा पाएंगे? हालिया वर्षो में भारत-नेपाल के बीच बढ़ी दूरियां और चीन से नजदीकियों के सबब पर फिलहाल कुछ कहना मुश्किल है। असल में भारत के दो पड़ोसी नेपाल और भूटान तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद से अपनी तरक्की, खुशहाली और सुरक्षा के लिए एक तरह से हम पर ही आश्रित रहे हैं। भूटान तो अभी भी आंखें मूंद कर भारत पर भरोसा करता है। यही वजह है कि डोकलाम जैसी सीमा पर चीन से उसकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है और भारतीय सेनाएं वहां से न हटने के लिए प्रतिबद्ध हैं। नेपाल की भी यही स्थिति थी, लेकिन अब नेपाल भारत और चीन के साथ मोलभाव की नीति पर चलता है। अर्थात वह दोनों तरफ से अच्छे प्रस्ताव की प्रतीक्षा करता है। यही वजह है कि पिछले कुछ दशकों से काठमांडू की राजनीति में उसका अमल-दखल बढ़ गया है। नेपाल में चीन का हस्तक्षेप विशेषकर तब अधिक बढ़ गया जब दुनिया के अकेले हिंदू राष्ट्र से लोकतांत्रिक राष्ट्र की तरफ कदम बढ़ाने के दौरान नए संविधान की बहाली को लेकर दोनों देशों के रिश्तों में ज्यादा खटास आ गई। नेपाल अपने यहां उस समय से जारी मधेसी आंदोलन को भारत समर्थित होने का आरोप लगाता रहा है जबकि भारत का मानना है कि उसके संविधान में मधेसियों समेत नेपाल के सभी लोगों को प्रतिनिधित्व मिले। 2015-16 के दौरान मधेसी आंदोलन के दौरान भड़की आग पर चीन ने निजी स्वार्थो की खूब रोटियां सेकीं और उस समय भारत-नेपाल सीमाओं की नाकेबंदी से मचे हाहाकार में अपने यहां से नेपाल को पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति की। भारत के विरोध के बावजूद नेपाल ने चीन के वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) पहल में हिस्सा लिया जिसके तहत वह तिब्बत के ल्हासा से राजधानी काठमांडू तक आठ बिलियन डॉलर का रेल लिंक बनाना चाहता है। इसी तरह नेपाल में चीन सड़क और पनबिजली की परियोजनाएं चलाने का भी इच्छुक है। यही नहीं वह नेपाल में भारत विरोधी समूहों को कुमाऊं और गढ़वाल जैसे भारतीय इलाकों को जोड़ने के सब्जबाग भी दिखा रहा है। प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के जरिए प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले अधिकारिक विदेशी दौरे के तौर पर भारत को प्राथमिकता देने से उसके कान खड़े हो गए हैं। इसके मद्देनजर चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग अक्टूबर महीने में नेपाल यात्र की योजना बना रहे हैं। उन्हें कहीं न कहीं देउबा और उनकी पार्टी नेपाली कांग्रेस के भारत की तरफ अधिक झुकाव का अंदाजा है। दूसरी तरफ निकाय चुनाव में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली अपने चहेते नेता केपी ओली की यूएमएल पार्टी के फिर से सत्ता में लौटने की भी उम्मीदें हैं। इन परिस्थितियों में भारत के पास देउबा की पार्टी नेपाली कांग्रेस को समर्थन देकर केपी ओली और उनके दल को दूर रखना सबसे बेहतर विकल्प है। देउबा ने नए संविधान में मधेसियों को उचित प्रतिनिधित्व देने की बात पहले ही कही है, लेकिन इसके लिए उनकी पार्टी के पास फिलहाल संसद में आवश्यक संख्याबल नहीं है। देउबा मजबूत रहे तो भारत की आशंकाएं तो दूर होती रहेंगी।

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