दीक्षा समन्वित शिक्षा प्रणाली ही नैतिकता व चारित्रिक उत्थान की द्योतक – साध्वी विश्वम्भरा भारती

दीक्षा समन्वित शिक्षा प्रणाली ही नैतिकता व चारित्रिक उत्थान की द्योतक – साध्वी विश्वम्भरा भारती

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः दिल्ली, शालीमार बाग में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा नवाह ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिवस सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या भागवताचार्य महामनस्विनी साध्वी विश्वम्भरा भारती जी ने बताया कि वास्तव में शिक्षा केन्द्रों में प्रदान की जाने वाली शिक्षा का मुख्य उद्देश्य यही है कि वह अनघड़ मानव पुतलों में मानवता के प्राणों का संचार करे। इन शिक्षा केन्द्रों का मुख्य कर्तव्य यह है कि वह विद्यार्थियों में संवेदनशीलता, परोपकार, न्याय, संयम व सहनशीलता जैसे गुण प्रकट करे। इसमें कोई संशय नहीं कि मानव समाज की नींव का सबसे प्रथम व अहम पत्थर शिक्षा ही होता है। परन्तु आधुनिक शिक्षा पद्धति नेत्रहीनता की शिकार होने के साथ-साथ पंख विहीन होती नज़र आ रही है। जिस शिक्षा पद्धति से जुड़कर मानव अपने मूल से विलग हो गया वो अपनी संस्कृति से कैसे जुड़ सकता है और जो अपनी संस्कृति से अलग हो गया वो कभी भी बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं दे सकते।आधुनिक शिक्षा पद्धति का प्रभाव समाज में व्याप्त समस्याओं में प्रबल रूप से देखा जा रहा है। शिक्षा विषारद कहते हैं कि समाज को सुशिक्षित करो लेकिन अब भी एक प्रश्न अधर में झूल रहा है क्या समाज को शिक्षित कर के समस्या एंव बुराईयाँ दूर हो गई? शिक्षा का प्रसार होने से बच्चे संस्कारवान हो गए? यदि ऐसी बात है तो समाज में नित्य प्रतिदिन नैतिक और चरित्र हनन की घटनाऐं क्यों सुनने को मिल रही हैं? शैक्षणिक संस्थाओं में बच्चों द्वारा की जाने वाली हिंसक घटनाऐं किस बात का संदेश दे रही हैं? शास्त्र तो कहते हैं कि विद्या वही है जो विनय शीलता प्रदान करे। परन्तु हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चों की मनः स्थिति को नहीं बदल पाती जिस कारण वह बदले की भावना से ग्रसित रहता है। इन समस्याओं के मूल को समझने की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानंद जी ने वर्तमान शिक्षा पद्धति को नकारात्मक शिक्षा पद्धति का दर्जा दिया। रवेन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि जो हमारा शिक्षित वर्ग है वह सुसंस्कृत वर्ग न होकर केवल मात्र उपाधिधारी उम्मीदवारों का वर्ग है। अधिकांश छात्र इसी उद्देश्य से विद्यालयों में दाखिल होते हैं कि उन्हें अच्छी डिग्री व नौकरी हासिल हो। इसके लिए वह गलत साधन अपनाने से भी गुरेजन हीं करते।
उन्होंने बताया कि यह स्पष्ट बात है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली अपना दायित्व पूर्ण नहीं कर पा रही है। छात्रों के चारित्रिक विकास के लिए उनके पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को भी जोड़ा गया लेकिन फिर भी कोई परिवर्तन नज़र नहीं आ रहे। प्रश्न यह उठता है कि मूल्य आधारित शिक्षा के साथ वह कौन सी विद्या प्रदान की जाए कि छात्रों के व्यिंतव में आमूल परिवर्तन आ पाए जो समाज के लिए एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा पायें? छात्रों के दिमाग को सिर्फ बाहरी जानकारियों का गोदाम न बनाया जाए बल्कि इसके साथ ही उनमें जीवन संबंधित मूल्यों को भी रोपित किया जाए ताकि उससे व्यवाहिक आदर्श व नैतिक मूल्यों की फसल पैदा हो सके। बच्चों की प्रज्ञा में सनातन संस्कार डालने के लिए हमें उसी पद्धति को अपनाना होगा जो वैदिक काल में प्रचलित थी जिसमें शिक्षा के साथ-साथ दीक्षा को भी महत्त्व दिया गया। ताकि शिक्षा प्राप्त करने के बाद बच्चा विध्वंसनात्मक कार्य न करे बल्कि उसके कार्य सृजनात्मक दृष्टिकोण को लेकर हों।वर्तमान शिक्षा प्रणाली रोग के लिए औषधि के सेवन की बात तो करती है लेकिन वह यह नहीं जानती कि औषधि क्या है। उसी औषधि के बारे में शिक्षा नहीं अपितु दीक्षा के माध्यम से पता चलेगा। दीक्षा समन्वित शिक्षा प्रणाली ही वर्तमान काल में नैतिकता व चारित्रिक उत्थान की द्योतक है।आधुनिक शिक्षालयों में दीक्षा प्रदान नहीं की जा सकती क्योंकि यह एक तत्व वेतामहापुरुष का ही कार्य है। आत्मिक विकास न होने के कारण आधुनिक शिक्षा प्रणाली दीक्षा के बिना अपूर्ण है।

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