खेती पर संकट या युद्ध होने पर ज्यादा उधार ले सकेगी सरकार

नई दिल्ली/नगर संवाददाताः खेती पर संकट और युद्ध की स्थिति में सरकार निर्धारित सीमा से अधिक उधार ले सकेगी। सरकार ने राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजटीय प्रबंधन कानून की समीक्षा के लिए जिस समिति का गठन किया था, उसने यह सिफारिश की है। समिति ने सरकार को राजकोषीय अनुशासन बनाए रखते हुए मार्च 2020 तक राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में तीन प्रतिशत तक रखने की सिफारिश भी की है। साथ ही राजकोषीय घाटे का सालाना लक्ष्य तय करने को एक परिषद बनाने का सुझाव भी समिति ने दिया है। राज्यसभा के पूर्व सदस्य एन. के. सिंह की अध्यक्षता वाली इस समिति ने वैसे तो इस साल जनवरी में ही सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी लेकिन इसे बुधवार को सार्वजनिक किया गया। समिति ने राजकोषीय घाटा कम करके वित्त वर्ष 2020-21 में 2.8 प्रतिशत तथा 2022-23 में घटाकर 2.5 प्रतिशत के स्तर पर लाने को कहा है। हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्ध, राष्ट्रीय आपदा और खेती पर गंभीर संकट की स्थिति में सरकार को एफआरबीएम कानून के तहत निर्धारित सीमा से अधिक उधार लेने की इजाजत देने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि सरकार निर्धारित सीमा से 0.50 प्रतिशत अधिक उधार ले सकती है। इस तरह समिति ने राजकोषीय घाटे की एक निर्धारित सीमा के साथ-साथ विशेष परिस्थितियों के लिए रेंज रखने का सुझाव दिया है। दरअसल राजकोषीय घाटे से आशय किसी वित्त वर्ष में सरकार के कुल व्यय और कुल राजस्व प्राप्तियों के अंतर से है। इसकी गणना सरकार के कुल व्यय में से राजस्व प्राप्तियों, वसूली की ऋण राशि और अन्य प्राप्तियों को घटाकर किया जाता है। इस तरह सरकार व्यय को पूरा करने के लिए जो राशि उधार लेती है, वह राजकोषीय घाटा होता है। इसे सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है। समिति ने राजस्व घाटे में भी साल दर साल 0.25 प्रतिशत की कटौती करने को कहा है। राजस्व घाटे का मतलब राजस्व व्यय और राजस्व प्राप्तियों में अंतर होता है। चार खंडों में अपनी रिपोर्ट में समिति ने कहा है कि चालू वित्त वर्ष में राजस्व घाटा 2.05 प्रतिशत होना चाहिए। वहीं अगले वित्त वर्ष में इसे घटाकर 1.8 प्रतिशत तथा वित्त वर्ष 2019-20 में कम करके 1.55 प्रतिशत के स्तर पर लाना चाहिए। समिति का कहना है कि वित्त वर्ष 2022-23 में राजकोषीय घाटा कम करके 0.8 प्रतिशत के स्तर पर लाना चाहिए। समिति ने मौजूदा एफआरबीएम कानून 2003 और एफआरबीएम नियम, 2004 को खत्म कर इसकी जगह नया कर्ज और राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून बनाने की सिफारिश भी की है। साथ ही राजकोषीय घाटे का सालाना लक्ष्य तय करने को तीन सदस्यीय काउंसिल बनाने का सुझाव भी समिति ने दिया है। समिति का यह भी कहना है कि सरकार को आरबीआइ से उधार लेने से परहेज करना चाहिए।

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