सुप्रीम कोर्ट ने सिंधु जल संधि को खत्म करने की याचिका खारिज की

नई दिल्ली/नगर संवाददाताः सुप्रीम कोर्ट ने आज भारत और पाकिस्तान के बीच के सिंधु जल समझौते को लेकर दाखिल जनहित याचिका को खारिज कर दिया। वकील एमएल शर्मा की ओर से इस समझौते को असंवैधानिक करार देते हुए सिंधु जल समझौते को रद्द करने की मांग की गयी थी। वर्ष 1960 में तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरु और अयूब खान के बीच यह संधि हुई थी। हालांकि वर्ष 2016 के सितंबर माह में हुए उड़ी हमले के बाद से इस संधि को तोड़ने के विकल्पों पर विचार करने की बात उठी। इससे पहले कोर्ट की सुनवाई के दौरान तत्कालीन मुख्य न्ययाधीश टीएस ठाकुर की ओर से मामले की जल्द सुनवाई की मांग से इनकार किया गया था। सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच सतलुज, व्यास, रावी, सिंधु, झेलम और चेनाब नदियों के पानी के बंटवारा से संबंधित है। इस संधि के तहत सतलुज, व्यास और रावी का ज्यादातर पानी भारत के हिस्से में आता है, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का ज्यादातर पानी पाकिस्तान के हिस्से में आता है। सिंधु का पानी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कितना जरूरी है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान में होने वाली कुल सिंचित खेती का 80 फीसदी पानी सिंधु नदी से लिया जाता है। उड़ी हमले के बाद जब भारत की ओर से इस संधि को तोड़ने पर विचार किया गया, तो पाकिस्तान की ओर से कहा गया कि भारत इस संधि को एकतरफा नहीं तोड़ सकता है। पाकिस्तान के मुताबिक संधि के दौरान विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र मध्यस्थ थे। ऐसे में बिना उनकी मंजूरी के बिना भारत के लिए यह संधि तोड़ना संभव नहीं होगा। जबकि भारत किसी भी तीसरे पक्ष द्वारा दखलंदाजी किए जाने का विरोध करता रहा है। बता दें कि सिंधु जल संधि के इतर पाकिस्तान भारत पर सिंधु और उसकी सहायक नदी पर बांध बनाने का विरोध करता रहा है।

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