अध्यात्म हमारे आंतरिक जुनून व जजबे को एक सशक्त आधार प्रदान करता है-श्री आशुतोष महाराज जी

अध्यात्म हमारे आंतरिक जुनून व जजबे को एक सशक्त आधार प्रदान करता है-श्री आशुतोष महाराज जी

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः अलीपुर जेल से रिहा होने के पश्चात् अरविंद घोष जब बाहर आए, तब उनका बाह्य वेश तो पूर्ववत् ही था, परन्तु आंतरिक स्वरूप आमूल-चूल बदल चुका था। उन्हें इस प्रकार परिवर्तित देखकर अनेकों उँगलियाँ उठ गईं। लोगों ने आक्षेप लगाए- ‘अध्यात्म ने एक योद्धा को योगी बना दिया है। उसके अस्त्रा-शस्त्रा छीन लिए हैं। स्वतंत्राता-संग्राम के अंगारो भरे पथ से सन्यास की शांत डगर पर मोड़ दिया है।’ लोगों के इन व्यंग-मिश्रित आक्षेपों के प्रत्युत्तर में अरविंद ने कहा- ‘हाँ, मैं योद्धा से योगी बन गया हूँ। पर मैंने अपने अस्त्रा-शस्त्रा नहीं फेंके। बल्कि साधना के तेज से उन्हें और अधिक धारदार कर लिया है। उन्हें दिव्यास्त्रा में परिणत कर दिया है। ऐसे दिव्यास्त्रा जो अब सीधे मर्मस्थान को बेधेंगे। समस्या का मूलोच्छेद करंेगे, स्मरण रखना कि स्वतंत्रता ऐसे राजनीतिक-सन्यासियों की मंडली द्वारा ही प्राप्त होगी, जिन्होंने ईश्वर से जुड़कर मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया हो।’ ऐसे आरोप, जो श्री अरविंद पर लगे, सदा से महापुरुषों पर लगते रहे हैं। बहुध समाज की अवधरणा है कि अध्यात्म और देशभक्ति रेल की पटरी के दो छोर या नदी के दो पृथक किनारे हैं। परन्तु यह धरणा नितांत निराधर है। वस्तुतः अध्यात्म तो हमारे आंतरिक जुनून व जजबे को एक सशक्त आधार प्रदान करता है। देश-प्रेम को दिव्य शक्ति का संबल देता है। स्वामी विवेकानंद यूँ तो आध्यात्मिक जाग्रति के पुरोध थे, परन्तु उनका आध्यात्मिक मिशन, उनकी क्रियाएँ, उनका स्वरूप- सब का सब देश-सेवा व उसके उन्यन को समर्पित था। एक अमरीका यात्रा के अंतर्गत, मैकलाईट नामक एक विदेशी महिला उनके विचारों से बहुत प्रभावित हो गईं। अपनी भावना प्रकट करते हुए बोलीं- ‘स्वामी जी, मैं किस प्रकार आपके कार्य में सहयोग दे सकती हूँ?’ इतना सुनना था कि स्वामी जी की रगों में बहता देश-प्रेम शब्दों में छलक पड़ा। मात्र एक पंक्ति में उत्तर दिया- ‘भारत से प्रेम करो।’ इसी प्रकार जब वे इंग्लैंड से वापिस भारत लौटने लगे, तो एक अंग्रेज ने उनसे पूछा- ‘चार वर्ष तक पाश्चात्य देशों के वैभव तथा समृद्धि का अनुभव कर लेने के पश्चात् अब भारत लौटने पर आपको अपनी भूमि कैसी प्रतीत होगी?’ उत्तरस्वरूप जो शब्द स्वामी जी ने कहे, वे अत्यंत मार्मिक और स्पष्ट थे- ‘विदेश यात्रा से पूर्व मैं भारत से मात्रा प्रेम करता था, परन्तु अब उसकी पूजा करूँगा। अब तो भारत की धूल तक मेरे लिए पवित्र है, वहाँ की वायु भी मेरे लिए पावन है। अब भारत मेरे लिए पुण्य भूमि, तीर्थस्थान है।’ स्वामी जी से मुखरित ये कथन केवल अलंकारों की झड़ी भर नहीं थे। प्रत्युत आध्यात्मिक बाने में धड़कते एक सच्चे देशभक्त की शुद्ध भावनाएँ थीं। ये भावनाएँ उनके पाश्चात्य देशों में दिए गए व्याख्यानों में भी गूँजती थीं। इसी प्रकार स्वामी रामतीर्थ भी जापान, अमरीका आदि कई देशों में गए। जब वहाँ से लौटे, तो उन्होंने भारतवासियों को अध्यात्म से पूर्व देशप्रेम की ही प्रेरणा दी। और इस प्रकार बचपन से ही प्रत्येक जापानी की रगों में अपने देश के लिए मर-मिटने का जुनून ठाठें मारता है।’ रामतीर्थ प्रवाहशील बोल रहे थे। अन्ततः बोले- ‘मेरे देशवासियों, विदेशों में मेरी आँखों और कानों ने जो कुछ संजोया, केवल एक ही भाव से कि आप लोगों को कुछ पे्ररणा मिल सके। आपमें जल रही देशभक्ति की भावना धधकती आग में बदल सके। राम विदेशों में जरूर रहा। पर राम के भीतर, उसकी यादों में, उसकी बातों में, उसकी आँखों में, यदि कोई रहा तो केवल उसका भारत! बर्फ होने के कारण पैरों में जूते बेशक विदेशी थे, पर सिर पर पगड़ी हमेशा हिन्दुस्तानी रही, क्योंकि राम के मन-मस्तिष्क में केवल उसका देश बसता है। उसके सिर पर कोई फबा है तो केवल उसका भारत।’
स्वामी दयानंद की देशभक्ति भी कुछ कम अनुपम नहीं थी। ‘स्वतंत्राता’ शब्द भारत को उन्हीं की देन है। बेधड़क और निशंशक अंदाज में, सीना ठोंककर, वे अपना देश-प्रेम जाहिर किया करते थे। दिसम्बर, सन् 1872 की घटना है। वेदों के प्रचार में संलग्न दयानंद जी की कलकत्ता में वायसराय लार्ड नार्थ ब्रुक से भेंट हुई। उसने स्वामी जी से बड़ी स्निग्ध वाणी में कहा- ‘स्वामी जी, हम आपके आध्यात्मिक भाषणों से बहुत प्रसन्न हैं’ फिर तुरन्त इन मीठे शब्दों की ओट में अपना स्वार्थ-राग अलापता हुआ बोला- ‘बस आपसे एक गुजारिश है। आप अपने व्याख्यानांे का अंत इस प्रार्थना से किया करें- अंग्रेजी शासन भारत में सुदृढ़ व अखण्ड हो- इससे आपका काम भी चलता रहेगा और हमारा भी।’ ऐसा सुनना था कि स्वामी दयानंद का तो रोम-रोम ललकार उठा। बुलंद स्वर में उन्होेंने दो टूक उत्तर दे डाला- ‘अखण्ड अंग्रेजी शासन के लिए प्रार्थना तो बहुत दूर की बात है, वायसराय जी। मैं तो प्रतिदिन, हर क्षण, हर साँस में यही प्रार्थना में रत हूँ कि अंग्रेजी राज्य का नाश हो और हमारा भारत उसके शासन से स्वतंत्रा हो।’ अध्यात्म के धरातल से उत्फल इस निर्भीक स्पष्टवादिता का तोड़ ब्रिटिश साम्राज्य के पास नहीं था।
श्री अरविंद जी ने भी अपने आराध्य से यदि वरदान भी माँगा, तो देखिये क्या माँगा- ‘तू मेरे हृदय की बात जानता है। तू यह जानता है कि मैं मुक्ति नहीं माँगता, और न मैं ऐसी कोई वस्तु माँगता हूँ जो अन्य माँगते हैं। मैं तो केवल ऐसी शक्ति माँगता हूँ जिससे इस राष्ट्र का उत्थान कर सकूँ।’ स्वहित को पूर्णतः नकारते हुए, उन्होंने सदा देशहित को प्राथमिकता दी। 700रु प्रतिमाह के वेतन की नौकरी ठुकारकर मात्रा 150रु महीने की नौकरी को सहर्ष स्वीकार किया। क्योंकि यह कम वेतन वाली नौकरी उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में अधिक सशक्त व सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर देती थी। वे सदा अपने शिष्यों को भी यही दिशा-निर्देश दिया करते थे- ‘हर राष्ट्र के इतिहास में ऐसे अवसर आते हैं, जब विधता उसके सामने एक ऐसा उद्देश्य प्रस्तुत कर देता है, जिसके लिए उच्च से उच्च त्याग निम्न होता है। अब वही समय आ गया है। इसलिए पढ़ना है, तो उसी की सेवा के लिए, अपने मन और आत्मा को प्रशिक्षित करना है तो उसी की सेवा के लिए। जीविकोपार्जन करो तो इसलिए कि उसी के लिए जी सको। सुदूर विदेशों में जाओ तो इसलिए कि ज्ञान-राशि लेकर वापस आओ, ताकि माँ की सेवा कर सको। काम करो ताकि उसकी समृद्धि हो।’ इस एक उपदेश में सभी कुछ समाहित है। अध्यात्म और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत समनव्य है।

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