ब्रह्मज्ञान के भुवन-भास्कर हैं श्री आशुतोष महाराज जी

ब्रह्मज्ञान के भुवन-भास्कर हैं श्री आशुतोष महाराज जी

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः प्रिय पाठक गणों! यह कहना, अति शक्तिपूर्ण नहीं होगा कि गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी ‘अध्यात्म की प्रचण्डक्रांति’ हैं। एक ऐसी आँधी हैं, जो अध्यात्म की सारी रूढ़िवादी मान्यताओं, परिभाषाओं व अंध-धारणाओं को जड़ से उखाड़ने को तत्पर है। आज समाज के लिए भगवान सिर्फ कुछ एक धर्मिक-स्थलों, धर्मिक-ग्रंथों और पारंपरिक कर्म-काण्ड़ों तक ही सीमित है। लेकिन गुरु महाराज जी ने आध्यात्मिक क्रंति का बिगुल बजाया। शास्त्रों-ग्रंथों के आधार पर न केवल यह बताया कि ईश्वर को देखा जाता है। भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। बल्कि उसे प्रत्यक्ष प्रकट कर दिखाया। एक समय था, जब यह माना जाता था कि सूरज पृथ्वी के इर्द-गिर्द चक्कर काटता है। लेकिन उस समय एक वैज्ञानिक हुए गैलीलियो। उन्होंने एक विरोध्ी स्वर उठाया। समाज को Heliocentric view of the World’ सूर्य केन्द्रित विश्व व्यवस्था दिया। इस वजह से गैलीलियो को कटघरे में खड़ा होना पड़ा। एक दिन जब वे कोर्ट आॅफ जस्टिस से बाहर निकल रहे थे, तो उन्होंने जोर-जोर से धरती पर पैर पटके और चीख-चीख कर कहा- ‘ये लोग समझते क्यों नहीं? ये जो धरती है, यह अब भी सूरज के इर्द-गिर्द घूम रही है। सूरज धरती के इर्द-गिर्द नहीं!’ गैलीलियो ने एक दूरबीन का भी आविष्कार किया, जिससे उन्होंने विज्ञान जगत के सामने अंतरिक्ष का नक्शा प्रकट करके रख दिया और प्रयोगात्मक विज्ञान को समाज के सामने रखा। इसी तरह गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी ने प्रयोगात्मक अध्यात्म (Practical Spirituality) को समाज के सामने रखा। गैलीलियो ने दूरबीन (telescope)  दी थी। महाराज जी ने दिव्य दृष्टि साधकों के अंदर प्रकट की। लाखों जिज्ञासुओं को ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन कराया। उनके अंतर्जगत में दिव्य साक्षात्कार कराया और आज भी करा रहे हैं। उनमें से जो अभ्यासी साधक हैं, जो ईमानदारी से त्रिकुटि में ध्यान लगाते हैं, वे श्री महाराज जी की इस महिमा को जानते हैं। वे जानते हैं कि अध्यात्म के सबसे उँचे शिखर पर आसन लगा है। गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी का! पश्चिम के एक लेखक हैं, कैननडोएल। अपनी एक पुस्तक में वे लिखते हैं ‘It is a capital mistake to theorize before one had data. अर्थात् यह एक बहुत बड़ी गलती है कि यदि जो आप सिद्धांत रचते हैं, उसका आपके पास कोई तथ्य नहीं है। पर गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी इससे भी एक कदम आगे की बात करते हैं। महाराज जी कहा करते हैं- ‘यह उससे भी बड़ी गलती है कि यदि जो सिद्धांत आपने रचा है, आपके पास उसके प्रयोगात्मक तौर पर जीवन में लागु करने का सामर्थ नहीं है।’
गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी में यह सामर्थ है। उन्होंने ईश्वर और अध्यात्म की बात की, तो उसे लोगों के जीवन में प्रकट भी कर दिया। ऐसे ‘अध्यात्म के सूर्य’, ‘ब्रह्मज्ञान के भुवन-भास्कर’ है श्री आशुतोष महाराज जी।

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