पर्यावरण प्रदूषण जीवन के लिए बना संकट- साध्वी श्रेया भारती जी

नई दिल्ली/अरविंद यादवः श्री राम राज्य गौशाला के पीछे उजड़खेड़ा-1, बड़नगर रोड़, उज्जैन में दिनांक 12 से 18 मई 2016 तक श्री राम कथा ज्ञान यज्ञ का भव्य व विशाल आयोजन किया जा रहा है। जिसमें सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या मानस मर्मज्ञा महामनस्विनी सुश्री श्रेया भारती जी ने कथा के दूसरे दिन प्रभु श्री राम जी के बाल्य काल से लेकर विवाह तक की गाथा का व्याख्यान किया। सीता स्वयंवर प्रसंग में विश्वामित्र जी ने भगवान राम को गंगा की महिमा बताते हुए कहा कि वह अपने उदगम से लेकर सागर विलय तक भारत के विशाल भू भाग का स्पर्श करती हुई अपने आप में सभ्यता और संस्कृति के इतिहास का जीवंत साक्ष्य है। गंगा नदी केवल नदी नहीं है यह भारतीय संस्कृति की संवाहिता है। हमारे शास्त्रों में गंगा और गोविंद का सम कर दिया, उनमें कोई फर्क नहीं रखा गया। परंतु हम अपने घरों में गोविंद को तो पूज लेते है लेकिन गंगा में आकर सब विसर्जित करके हम उसके जल को प्रदूषित कर रहे है। ऐसे में गोविंद पूजा सार्थक कैसे हो सकती है। गोविंद पूजन तभी सार्थक है जब गोविंद की प्रकृति से प्रेम करेंगे। पर्यावरण असंतुलन की समस्या का उठाते हुए साध्वी सुश्री श्रेया भारती जी ने कहा कि समाज मानव मन की अभिव्यक्ति है। जब जब संतों के आदर्शों का परित्याग करते हुए मानव भाग वासना की ओर प्रवृत हुआ तब तब समाज रूपी गंगा विषाक्त होती गई। जरूरत है मन को प्रदूषण से मुक्त करने की जब मन का प्रदूषण समाप्त होगा तब बाहरी पर्यावरण स्वतः ही स्वच्छ हो जाएगा। इसके लिए आवश्यकता है ब्रह्मज्ञान की। जो मानसिक शुद्धता का सशक्त साधन है और वो किसी तत्ववेता संत से ही प्राप्त हो सकता है। हमें आवश्यकताओं और लालसाओं में भेद करना होगा। जितनी लालसाये बढ़ेंगी उतना ही प्रकृति का दोहन होगा। क्या हम आने वाली पीढ़ियों को ऐसी दुनिया देना चाहेंगे। जिसकी हवाओं में जहर घुला हो, जहां धूल, धूआं और बीमारियां आम बात हो। जहां सूखा और बाढ़ विनाश की सृष्टि करते हों। संभवतः कोई भी माता पिता अपने बच्चे को ऐसी विभीषिक दुनिया नहीं देना चाहेगा। यदि हमें एक स्वच्छ व सुंदर समाज का निर्माण करना है तो भारतीय संस्कृति जीवन दृष्टि को पुनर्जीवित करना होगा और उसे सक्रिय रूप से लागू करना होगा।

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