बाघ से राष्ट्रीय पशु का दर्जा छीनने को तैयार सिंह आखिर राजसत्ता का प्रतीक कैसे बना

राजकोट/गुजरात, हार्दिक हरसौरा : सिंह ऐतिहासिक रूप से राजसत्ता के प्रतीक चिह्नों में शामिल रहा है और अब यह बाघ से भारत के राष्ट्रीय पशु का दर्जा छीन सकता है बाघ पूरे भारत में पाया जाता है लेकिन टीपू सुल्तान को छोड़कर शायद ही किसी राजा ने उसे राजप्रतीक बनाया हो. वहीं सिंह उन देशों में भी राजसत्ता का प्रतीक बन चुका है जहां कभी उसका अस्तित्व नहीं रहा.
पिछले साल नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव की रैलियों के दौरान बार-बार ‘गुजरात मॉडल’ की चर्चा करते थे. विरोधी भी इस बात के लिए अक्सर उनपर निशाना साधते थे कि मोदी गुजरात से अभिभूत हैं और पूरे देश को उसी ढर्रे पर चलाना चाहते हैं. इस महीने मोदी सरकार को एक साल पूरा होने वाला है. यह विश्लेषण अभी बाकी है कि उन्होंने राष्ट्रीय योजनाओं में गुजरात मॉडल को कितनी तवज्जो दी. लेकिन एक मामले में ऐसा लग रहा है कि वे सच में गुजरात से काफी अभिभूत हैं.
पिछले कुछ दिनों से मीडिया में चल रही खबरों की मानें तो केंद्र सरकार बाघ के बजाय शेर यानी सिंह को राष्ट्रीय पशु बनाने पर पूरी गंभीरता से विचार कर रही है. सिंह पूरे भारत में सिर्फ गुजरात में पाए जाते हैं. बाघ को 1972 में राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया था. अब यदि सरकार सिंह को राष्ट्रीय पशु बनाने का एक प्रस्ताव स्वीकार कर लेती है तो जल्दी ही बाघ राष्ट्रीय पशु का दर्जा खो देगा और उसकी जगह सिंह ले लेगा. बाघ पिछले 44 साल से देश का राष्ट्रीय पशु है लेकिन इसके बारे में एक दिलचस्प तथ्य है कि यह देश के तमाम सरकारी प्रतीक चिन्हों से गायब है वन्य पशु संरक्षण कार्यकर्ता सरकार के इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध कर रहे हैं. उनकी दलील है कि यह प्रस्ताव बाघ बचाओ अभियान के लिए झटका साबित हो सकता है. वे कह रहे हैं कि इससे बाघ अभ्यारण्य
अभ्यारण्यों के पास औद्योगिक परियोजनाएं शुरू होने का रास्ता साफ हो जाएगा जो बाघों के लिए खतरा है.
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को यह प्रस्ताव राज्यसभा सांसद परिमल नाथवानी ने भेजा था जो बाद में राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) को भेज दिया गयाण् सूत्र बताते हैं कि मंत्रालय के अधीन काम काम करने वाले इस बोर्ड के सदस्यों में गुजरातियों की तादाद सबसे ज्यादा है. मार्च में यह खबर भी आई कि बोर्ड की स्टैंडिंग कमेटी ने इस मसले पर विचार.विमर्श किया है. पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस बैठक की अध्यक्षता की थी. बोर्ड के एक सदस्य रमन सुकुमार एक अखबार से बात करते हुए कहते हैं कि कमेटी ने मंत्रालय से अनुरोध किया है कि इस विषय पर विस्तृत विचार विमर्श की जरूरत है.
हालिया सर्वे से पता चला है कि भारत में इस समय 2200 से ज्यादा बाघ हैं और सिंहों की संख्या 411 के करीब है. बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के पीछे एनबीए का विचार था कि यह भारत के सभी हिस्सों में पाया जाता है यानी यह सही मायनों में राष्ट्रीय है और इसे संरक्षण की आवश्यकता है. बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के पीछे एनबीए का विचार था कि यह भारत के सभी हिस्सों में पाया जाता है यानी यह सही मायनों में राष्ट्रीय है और इसे संरक्षण की आवश्यकता है. बाघ पिछले 44 साल से हमारा राष्ट्रीय पशु है लेकिन इसके बारे में एक दिलचस्प तथ्य है कि यह देश के तमाम सरकारी प्रतीक चिन्हों से गायब है. भारत का राष्ट्रीय चिह्न अशोक स्तंभ है, जहां चार सिंहों के साथ बैल व घोड़े को जगह मिली है. हमारे कई राज्य अशोक स्तंभ को ही अपने राज्य चिह्न की तरह इस्तेमाल करते हैं. कुछ के अपने अलग राज चिह्न हैं लेकिन इनमें भी बाघ को कहीं तवज्जो नहीं मिली. जैसे केरल का राज चिह्न हाथी है तो उत्तर प्रदेश में एक जोड़ी मछलियां. अरुणाचल ने हार्नबिल (धनेश) भारतीय झंडे में पहले अशोक चक्र की जगह चरखा था. जवाहरलाल नेहरू की राय थी कि चरखे के बजाय कोई सिमेट्रिकल प्रतीक यहां ज्यादा व्यवहारिक होगा. इसलिए 22 जुलाई, 1947 को उन्होंने संविधान सभा के सामने एक नया झंडा पेश किया. इसमें चरखे की जगह अशोक का धर्म चक्र बना हुआ था. उस पीढ़ी के नेताओं ने यह मानकर स्वीकार कर लिया कि चक्र चरखे का भी प्रतीक है और सम्राट अशोक की शिक्षाओं का भी. जब झंडे पर धर्म चक्र आ गया तो इसी संदर्भ में राजकीय प्रतीक के रूप में चार सिंहों वाला अशोक स्तंभ भी चुन लिया गया. इन चार सिंहों को धर्म चक्र का रक्षक माना जाता है. इस आधार पर कहा जा सकता है कि आजादी के बाद जब भारत ने राजकीय चिह्न स्वीकार किया तो उससे इस बात का कोई लेनादेना नहीं था कि सिंह राजसत्ता का प्रतीक है.
इस समय केंद्र सरकार के स्तर पर सिंह को राष्ट्रीय पशु बनाने के प्रस्ताव पर जो भी चर्चा चल रही हो, लेकिन इस बात में कोई दोराय नहीं कि सिंह लोकतांत्रिक व्यवस्था से ज्यादा राजसत्ता का राजकीय प्रतीक रहा है. टीपू सुलतान ने अपने राजप्रतीक के रूप में बाघ को चुना था तो वह उस समय के हिसाब से ज्यादा लोकतांत्रिक चयन था. परिस्थितियां आज भी लगभग वैसी हैं.

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