समय की रेत पर छोड़ते चलो निशां, कल की तुम मिसाल हो, युवा तुम बेमिसाल हो!

bदिल्ली, अरविंद यादव : स्वामी विवेकानंद-माँ भारती का एक ऐसा सपूत जो इस ग्रह मंडल पर सिर्फ 39 वर्ष जीया, लेकिन मानव सभ्यता के इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ गया! जो एक युवा बनकर जीया और ‘युवा’ रूप में ही समाधिस्थ हो गया। जो विश्वभर के नौजवानों के लिए ‘नौजवानी’ की धड़कन बना! ‘विश्व धर्म सम्मेलन’ में जिसकी हाज़िरी ने दुनिया भर को झंझोड़ डाला था। हाँ, ऐसा ही था वह अद्भुत युवा संन्यासी. स्वामी विवेकानंद! यूँ तो वह आध्यात्मिक जाग्रति के पुरोधा थे, परन्तु उनका आध्यात्मिक मिशन, उनकी क्रियाएँ, उनका स्वरूप. सब का सब देश-सेवा व उसकी उन्नति के लिए समर्पित था। एक बार जब वे इंग्लैंड से वापिस भारत लौटने लगे, तो एक अंग्रेज ने बड़ी शान से उनसे पूछा- ‘आप चार वर्ष तक पाश्चात्य देशों में रहे। इन देशों के वैभव, तरक्की तथा समृद्धि का अनुभव कर लेने के बाद, अब भारत लौटने पर आपको अपनी भूमि कैसी प्रतीत होगी?’ उत्तर स्वरूप जो शब्द स्वामी जी ने कहे, वे इतने मार्मिक, गहरे और स्पष्ट थे कि उन्हें पढ़कर प्रत्येक भारतवासी बरबस ही उनकी देशभक्ति को सलाम कर उठे। उन्होंने कहा- ‘विदेश आने से पूर्व मैं भारत से केवल प्रेम करता था, परन्तु अब उसकी पूजा करूँगा। अब तो भारत की धूल तक मेरे लिए पवित्र है, वहाँ की वायु भी मेरे लिए पावन हैः भारत मेरे लिए पुण्य भूमि, तीर्थस्थान है।’ स्वामी जी के मुख से निकले ये कथन केवल अलंकारों की झड़ी भर नहीं थे। बल्कि आध्यात्मिक बाने में मौजूद एक सच्चे देशभक्त की शुद्ध भावनाएँ थीं। ये भावनाएँ उनके पाश्चात्य देशों में दिए गए व्याख्यानों में भी गूँजती थीं। एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा- ‘आप अपने भारत की गरिमा के बहुत ऊँचे-ऊँचे गीत गाते हैं। जबकि यह तो स्वयं आपकी आँखें भी स्पष्ट देख सकती हैं कि आपके भारत की अपेक्षा पाश्चात्य देशों ने कहीं ज्यादा उन्नति हासिल कर ली है। इतनी कि अब इनके सामने भारत तो बौना ही जान पड़ता है।’ स्वामी विवेकानंद ने उस व्यक्ति की टिप्पणी पर ज्यादा कुछ न कहते हुए बस यह दृष्टांत सुना दिया। एक बार वर्षा ऋतु के दिनों में, एक बेल एक पेड़ से लिपटते-लिपटते उससे भी ऊँची हो गई। अब बेल से अपनी बड़ाई किए बिना न रहा गया। बोली- ‘वृक्ष महोदय, आपकी 150 साल की जिन्दगी किस काम की? मुझे देखिए, चंद दिनों में ही मैंने उन ऊँचाइयों को पा लिया, जो आप इतने सालों में भी हासिल न कर पाए।’ वृक्ष बेल की बात सुनकर बस मुस्कुरा दिया। बेल हैरान होकर बोली- ‘आपको अपनी असफलता पर लज्जा आने की बजाए हँसी आ रही है! लगता है, आप लघुता के आदी हो चुके हैं। कमजोरी को ही अपनी शान समझने लगे हैं। क्यों, ठीक कहा न मैंने?’ वृक्ष, जो अब तक चुपचाप उस बेल के तानों को सुन रहा था, बोला- ‘तुम 150वीं बेल हो, जिसे मैं अपने ऊपर देख रहा हूँ। तुमसे पहले, तुम्हारे ही समान 149 बेलें आईं। मेरा सहारा लेकर ऊपर चढ़ीं, कुछ ऊँचा उठींए और तुम्हारी ही तरह उन्होंने भी मुझे अपनी उन्नति के राग सुनाए। पर जिस तेजी से वे ऊपर उठीं, उसी तीव्र गति से धराशायी भी हो गईं। लेकिन मैं खोखली ऊँचाई को पाकर वापिस मुँह के बल नहीं लुडका। मेरा अस्तित्व सदियों से सुदृढ़ रहा है और सदियों तक रहेगा।’यह दृष्टांत सुनाकर स्वामी जी ने अंग्रेज की ओर देखा। फिर मुस्कुराते हुए बोले- ‘श्रीमान! भारत ने भी बहुत देशों को चढ़ते हुए और चढ़कर गिरते हुए देखा है। लेकिन भारत का अस्तित्व दृढ़ है। भारत सदा ऊँचा रहा है और रहेगा…!’ वह केवल भावनाओं के ही नहीं बल्कि व्यक्तित्व के भी धनी थे। उनका ईश्वर पर दृढ़ विश्वास केवल वाणी में नहीं बल्कि व्यक्तित्व से भी झलकता था। एक बार स्वामी विवेकानंद जी अमरीका में निर्भयता पर व्याख्यान दे रहे थे। कुछ युवकों ने उनके विचार सुने, तो सोचने लगे- ‘इस प्रकार निर्भयता पर बोलने वाले तो बहुत हैं। क्यों न इनकी परीक्षा ली जाए और समाज के सामने इनकी सत्यता को रखा जाए कि ये मात्र शब्द ही दे सकते हैं।’ यही सोचकर उन्होंने स्वामी जी को अपनी संस्था में प्रवचन देने के लिए आमंत्रित किया। स्वामी विवेकानंद जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। निर्धारित समय व स्थान पर प्रवचन आरम्भ हुए। इस बार स्वामी जी का विषय रहा- ‘ईश्वर पर विश्वास।’ वे बार-बार कह रहे थे, जो व्यक्ति ईश्वर पर विश्वास करता है, वह हर परिस्थिति व खतरे में भी निडर रहता है। तभी अचानक गोलियाँ चलनी आरम्भ हो गईं। सारी सभा में भगदड़ मच गई। लोग बाहर की ओर भागने लगे। कुछ चिल्लाने लगे। कुछ बेहोश हो गए। परन्तु पूरी सभा में एक व्यक्ति दृढ़तापूर्वक पर्वत के समान अडिग खड़ा रहा। वे थे. स्वामी विवेकानंद। कई गोलियाँ उनके बहुत पास से निकलीं। परन्तु वे निश्चल खड़े रहे। कुछ समय बाद सब शांत हो गया। स्वामी विवेकानंद ने जहाँ प्रवचन रोके थे, वहीं से पुनः बोलना आरम्भ कर दिया। उनकी वाणी को सुनकर, लोग फिर से सभा में आने लगे। कुछ ही समय में पूरा हॉल दोबारा भर गया। स्वामी जी ने जब प्रवचन समाप्त किए, तो वे सभी युवक उनके पास आए और क्षमा माँगते हुए कहने लगे- आपकी परीक्षा लेने के लिए हमने ही गोलियाँ चलाई थीं। परन्तु हम जान गए, आप निडरता के आदर्श हैं। हमें बताइए स्वामी जी, आप इतना धैर्य, इतना संयम कैसे रख पाए।’ स्वामी विवेकानंद जी मुस्कुराते हुए बोले- ‘क्योंकि मैं जानता था कि जो गोली ईश्वर ने मेरे लिए नहीं बनाई, वह मुझे नहीं लगेगी। और जो गोली ईश्वर ने मेरे लिए बनाई है, वह मुझे लगेगी ही लगेगी। वह तो अनके सुरक्षा आवरणों को चीर कर भी मुझे लग जाएगी। और यदि ईश्वर ने ही मेरा काल निश्चित किया हुआ है, तो उससे घबराना या डरकर भागना कैसा? इसलिए ईश्वर पर अडिग विश्वास रखो। धैर्य व संयम अपने आप आएगा।’ किसी ने सच ही कहा है- ‘दुःखी होना है, तो नीचे देखो। डरना है, तो भविष्य को ताको। खुश होना है, तो ऊपर देखो। ध्यान बाँटना है, तो आस-पास झांको। परन्तु यदि मुक्त होना है, तो ब्रह्मज्ञान द्वारा ईश्वर से जुड़ो। इसलिए चयन हमारा है कि हम अपने जीवन को किस ओर ले जाते हैं।’

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