अयोध्या की फिजाओं में दिखने लगी 90 के दशक जैसी ‘गर्मी’

फैज़ाबाद, रामदेव शरण : भगवान राम की नगरी अयोध्या में एक बार फिर तीन दशक पूर्व 90 और 92 के दौर में हुए मंदिर आंदोलन जैसा माहौल दिखने लगा है। सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई टलने के बाद अयोध्या में सियासी कसरत शुरू हो गई है। इससे कहीं जोश तो कहीं संशय का भाव साफ देखा जा सकता है। सरयू तट पर बसी अयोध्या की फिजाओं में राम के नाम पर सियासी गर्मी के साथ 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले क्या-क्या अयोध्या में होगा? यह सवाल अयोध्यावासियों से लेकर दूर-दराज से आने तीर्थयात्रियों के जेहन में उठने लगा है। संतों की विराट धर्मसभा और शिवसेना के कार्यक्रम में जुटने वाले लाखों लोगों की भीड़ की संभावनाओं से संत और हिन्दू वर्ग उत्साहित और जोश से लबरेज है। तो वहीं मुस्लिम तबका 26 वर्ष बाद फिर से आंदोलन के नाम पर जुटने वाली भीड़ को लेकर आशंकित है। कुछ इलाकों में तो मुस्लिम परिवार कार्यक्रम के एक दिन पूर्व अयोध्या से बाहर जाने की भी तैयारी में जुट गए हैं। अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद मंदिर आंदोलन में संतों की भूमिका अहम रही है। इस आंदोलन के अग्रणी रहे स्वामी रामचंद्र परमहंस अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके जीवित रहते नगरी के बहुसंख्यक धर्माचार्यों की भूमिका आंदोलन के हम कदम के रूप में रही तो कुछेक मुखर विरोधी भी थे। राम मंदिर निर्माण के लिए एक बार फिर अयोध्या में 24 और 25 नवंबर को वीएचपी के आयोजन को लेकर कुछ संत जहां मौन साधे हुए हैं, तो वहीं तमाम धर्माचार्य समर्थन में खुलकर सामने आने लगे हैं।

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