दीपावली एक आध्यात्मिक संदेश : श्री आशुतोष महाराज जी

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दिल्ली, अरविंद यादव : दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ! हम सभी ने श्रीमद्भगवद् गीता, जो भारतीयों के पवित्रतम ग्रंथो में से एक है, के बारे में सुना भी है और पढ़ा भी है। हम जानते हैं कि यह गीता भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र की भूमि पर हुआ संवाद है। पर क्या आपने उस गीता के बारे में सुना है, जो इससे कुछ वर्ष पूर्व नहीं बल्कि एक युग पूर्व सुनाई गई थी? जिसके वक्ता प्रभु श्रीराम हैं और श्रोता श्री लक्ष्मण जी! जी हाँ! बिल्कुल सही पढ़ा आपने, हम ‘श्री राम-गीता की बात कर रहे हैं। इसका उल्लेख महर्षि वेद व्यास जी द्वारा रचित ग्रंथ, ‘अध्यात्म रामायण’ के उत्तराखण्ड के 5वें अध्याय में मिलता है। कहते हैं, एक बार माँ पार्वती ने भगवान शिव के समक्ष अपनी जिज्ञासा रखी, ‘प्रभु! अपनी भार्या सीता का परित्याग कर श्रीराम ने अपना शेष जीवन कैसे जीया? तब महादेव माँ पार्वती को समझाते हुए सारगर्भित बात बोले, ‘उमा! एक राजा होने के नाते प्रभु श्रीराम ने राज्य के प्रति अपने सभी कर्तव्यों और दायित्वों को पूर्ण किया। परन्तु सम्पूर्ण वैभवों से संपन्न अपने राजमहल में वे एक तपस्वी की भाँति रहे और राजर्षियों जैसा आचरण किया। आज तक जिन प्रभु राम को तुमने रघुकुल श्रेष्ठ, मर्यादा पुरुषोत्तम, पराक्रमी धनुर्धर, अद्वितीय वीर की भूमिका में देखा है और जो विष्णु के अवतार भी हैंः आज उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू, जिसमें वे एक गुरु की भूमिका में, एक ज्ञानी की भूमिका में उपस्थित हुए हैं, उसे मैं तुम्हारे समक्ष रखता हूँ।’ भगवान शिव ने तदोपरांत माँ पार्वती को एक प्रसंग सुनाया। ‘एक दिन प्रभु राम? जिनके चरणों की सेवा रमा जी करती हैं? एकांत में बैठे थे। तब वहां सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण जी पहुँचे और भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अति विनीत भाव से बोले. ‘हे महामते! आप शुद्ध ज्ञानस्वरुप, सबके हृदय में वास करने वाली आत्मा हैं, सबके स्वामी हैं, निराकार ब्रह्म स्वरुप हैं। जो कोई भी भक्ति भाव से आपके चरण कमलों में झुकता है, वही आपके वास्तविक स्वरुप का दर्शन ज्ञानदृष्टि से कर पाता है। हे प्रभु! योगीजन जिनका निरंतर चिंतन करते हैं, इस संसार से छुड़ाने वाले उन आपके श्री चरण कमलों की मैं शरण में हूँ। प्रभु, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे मैं सुगमता और शीघ्रता से इस अज्ञानरुपी अपार समुद्र के पार हो जाऊँ।’ लक्ष्मण जी के इस कथन से स्पष्ट है कि वे जगत जननी सीता के परित्याग की घटना के बाद अत्यंत व्याकुल थे। यूँ तो लक्ष्मण जी स्वयं ज्ञानवान हैं, शेषनाग के अंशावतार हैं; परन्तु फिर भी प्रभु की इस लीला के पीछे निहित कारण को वे जान नहीं पा रहे थे। अपने इसी अज्ञान को दूर करने के लिए वे विनम्रतापूर्वक प्रभु राम से प्रार्थना करते हैं। तब भूपाल शिरोमणि भगवान श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण को ज्ञानोपदेश देते हैं, जिससे उनका अज्ञान, मोह और दुःख दूर हो सके। आत्मज्ञान की विस्तृत व्याख्या प्रभु श्रीराम उन्हे समझाते हैं कि ‘इस संसार में सभी दुःखों का मूल करण अज्ञान ही है और इसका नाश ज्ञान की तलवार से ही किया जा सकता है। इसलिए हे सौमित्र! बुद्धिमान को ज्ञान विचार में ही तत्पर होना चाहिये। हे लक्ष्मण! आत्मा का शुद्ध स्वरुप अभी अज्ञान से आवृत्त है। अज्ञान के इसी आवरण को वेदांत में ‘माया’ कहा जाता है। परन्तु जिस समय परमात्मा और जीवात्मा के भेद को दूर करने वाला प्रकाशमय विज्ञान अंतःकरण में स्पष्टतः भासित होने लगता है, उसी समय आत्मा की संसार.प्राप्ति की इच्छा समाप्त हो जाती है। वह माया को छोड़कर मायापति का चिंतन करने लगती है। उस एकमात्र ज्ञानस्वरूप, निर्मल और अद्वितीय बोध की प्राप्ति होने पर फिर अविद्या उत्त्पन्न नहीं होती। इसलिए लक्ष्मण मोक्ष प्राप्ति के लिए, यह ज्ञान ही अकेला समर्थ है। उसे किसी और की अपेक्षा नहीं है।’ वह तुम हो! सामवेद के  छान्दोग्योपनिषद् में महावाक्य. ‘तत्त्वमसि’ का उल्लेख मिलता है। ‘तत्त्वमसि’ अर्थात् ‘वह तुम हो’। ‘वह’ यानि ‘सर्वोच्च सत्य’, ‘तुम’ यानि पंचकोशों से ढके तुम्हारे व्यक्तित्व का मूल आधार. ‘आत्मा’। तुम्हारी आत्मा ही सत्य के रुप में सर्वत्र व्याप्त है अर्थात् तुम सत्य से भिन्न नहीं तुम वही (परम सत्य यानी परमात्मा) हो। परम गुरु श्रीराम ने वेदों के इस मंत्र के माध्यम से लक्ष्मण को अध्यात्म का सार समझाया। ‘हे लक्ष्मण! गुरु के प्रति पूरी श्रद्धा रखो। फिर उनकी कृपा के प्रसाद से तुम इस महावाक्य. ‘तत्त्वमसि’ द्वारा परमात्मा और जीवात्मा की एकता को जानकर सुमेरु पर्वत की तरह निश्चल और सुखी हो जाओ। आइये, इसे एक उदाहरण से समझते हैं। समुद्र का पानी भाप बनकर बादल बन जाता है। यही घनीभूत होकर वर्षा के रूप में आता है। यही वर्षा का जल पहाड़ों व घाटियों से बहता नदियों का रूप ले लेता है। नदियाँ चाहे फिर किन्हीं भी क्षेत्रों में बहें, कोई भी रूप.रंग ले लें, उनके अलग.अलग नाम रख दिए जाएँ, किन्तु फिर भी वे हैं तो तत्त्वतः जल ही। समुद्र के जल और नदी के जल में मूलतः कोई अंतर नहीं, वे एक ही हैं। ठीक ऐसे ही, हर व्यक्ति अपना अलग.अलग व्यक्तित्व लिए चलता है, लेकिन हर व्यक्ति की चेतना और उस परमात्म.चेतना में कोई अंतर नहीं है। भगवान श्री राम यही गूढ़ तथ्य लक्ष्मण के समक्ष रखते हुए बोलेः ‘हे अनुज! तुम अनंत सत्य हो! तुममें और मुझमें कोई अंतर नहीं। तुम मन, बुद्धि या चित्त नहीं! तुम परम आत्मा हो, जो सैदव आनंदित रहती है। इसलिए तुम मेरे द्वारा सीता के त्यागने का शोक मत करो। ‘आगे श्रीराम आत्मा को परिभाषित करते हुए कहते हैं। ‘आत्मा न कभी मरती है, न जन्मती है, वह न कभी क्षीण होती है और न ही बढ़ती है। वह तो पुरातन, सम्पूर्ण विशेषणों से रहित, सुखस्वरूप, स्वयं प्रकाशमान, सर्वगत और अद्वितीय है। इसलिए हे अनुज! तुम अपने आत्मिक स्वरुप को ही सत्य जानो और बाकी सभी संशयों को ऐसे त्याग दो जैसे नारियल के जल को पीकर मनुष्य उसके खोल को फेंक देता है।’ ध्यानयोग-सर्वोच्च आध्यात्मिक साधना श्री राम आगे कहते हैं- ‘हे सौम्य लक्ष्मण! जिस रघुकुल श्रेष्ठ, पुरुषोत्तम राम को तुम जानते हो एवं जिसे तुम अपने ज्येष्ठ भ्राता के रूप में मानते आए हो, आज उसी राम के वास्तविक स्वरुप को मैं तुमसे कहता हूँ। मैं प्रकाश स्वरूप, अजन्मा, अद्वितीय, निरंतर भासमान, अत्यंत निर्मल, विशुद्ध विज्ञानघन, निरामय, क्रियाराहित एवं एकमात्र आनंदस्वरूप हूँ। हे अनुज! मैं सदा ही मुक्त, इंद्रियों से परे, सबके हृदय में वास करता हूँ। वेदवादी ज्ञानीजन नित्य मेरा ही चिंतन अपने हृदय में करते हैं। निरंतर मेरा चिंतन और ध्यान करने से अविद्या का नाश होता है। ठीक उसी प्रकार जिस तरह सेवन की गई औषधि रोग को नष्ट कर डालती है। इसलिए तुम मेरे वास्तविक स्वरुप का ही ध्यान करो।’ प्रभु श्रीराम फिर लक्ष्मण जी को ध्यान करने की विधि बताते हुए कहते हैं। ‘हे अनुज! ध्यान करने वाले पुरुष को चाहिये कि वह एकांत स्थान का चयन करे। फिर अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाए। अंतःकरण को अपने अधीन करे यानी इस संसार में भटकते हुए मन को अन्दर की ओर खींचे। इस प्रकार शुद्धचित्त हो केवल ज्ञानदृष्टि द्वारा आत्मा का साक्षात्कार करते हुए उसमें स्थित हो जाए। अन्य किसी साधन का आश्रय न ले। यही ध्यानयोग है। हे लक्ष्मण, इस प्रकार जो निरंतर ध्यान का अभ्यास करता है, वह अपने समस्त शत्रुयों (काम, क्रोध, भय, मोह आदि) को परास्त कर निरंतर मेरा ही दर्शन प्राप्त करता है। हे प्रिय! सम्पूर्ण श्रुतियों के साररूप इस अति गुप्त रहस्य को मैंने निश्चय कर तुमसे कहा है। जो बुद्धिमान पुरुष निरंतर इसका मनन व चिंतन करेगा, वह सभी पापों से सदा के लिए मुक्त हो जाएगा और मेरा ही रूप हो जाएगा। निष्कर्षतः प्रभु श्री राम द्वारा व्यक्त इस गीता का सार तत्त्व भी वही है। ‘ब्रह्मज्ञान की ध्यान-साधना’। यदि हम माया और भ्रम के जाल से निकलकर आनंद को प्राप्त करना चाहते हैं, तो इसका एकमात्र उपाय है। गुरु द्वारा प्रदत्त ब्रह्मज्ञान की ध्यान.साधना। न केवल आनंद की अनुभूति अपितु मोक्ष की प्राप्ति भी केवल ब्रह्मज्ञान द्वारा ही संभव है। यदि प्रभु राम द्वारा उद्घोषित इस गीता के हर पक्ष को आप अपने अंतर्जगत में प्रत्यक्ष करने के अभिलाषी हैं, तो उनके कथन के अनुसार एक पूर्ण गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर ईश्वर की वास्तविक ध्यान-साधना कीजिए।

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