सेना करती रही इंतजार और गुजरात जलता रहा, बच सकती थीं कई जानें

गांधीनगर, हार्दिक हरसौरा : गुजरात दंगों के दौरान वाहनों की प्रतीक्षा करते हुए सेना ने एक महत्वपूर्ण दिन गंवा दिया था। एयरफील्ड पर सेना वाहनों और आवश्यक सामान की प्रतीक्षा करती रही और इस दौरान गुजरात जलता रहा। इस अवधि में कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी। यह दावा भारतीय सेना के डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ पद से सेवानिवृत्त और तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा ‘द सरकारी मुसलमान’ के एक अध्याय में किया है जो गुजरात दंगों के दौरान सैन्य ऑपरेशन पर केंद्रित है। इसका विमोचन 13 अक्टूबर को दिल्ली में पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी करेंगे। पुस्तक के समर्थन में तत्कालीन जनरल एस. पद्मनाभन ने भी लिखा है। अमर उजाला के पास 212 पेज वाली इस पुस्तक की प्रति है, जिसके 7वें अध्याय में 114वें पेज पर ‘ऑपरेशन पराक्रम एंड ऑपरेशन अमन’ में शाह ने गुजरात दंगों के दौरान अपने अनुभव लिखे हैं। शाह ने विशेष बातचीत में कहा कि 2002 में 28 फरवरी से लेकर 1 मार्च की रात तक वे 3000 फौजी जवानों के साथ एयरफील्ड पर वाहनों और आवश्यक संसाधनों का इंतजार करते रहे। वे कहते हैं  ‘हम जैसलमेर के एक इलाके में स्ट्राइक कोर डिविजन में तैनात थे और जोधपुर से 28 फरवरी को 7 बजे से 10 बजे तक वायुसेना की 40 उड़ानों के जरिए अहमदाबाद एयरफील्ड पर पहुंचे थे। विमान जब लैंड कर रहे थे तो आकाश से अहमदाबाद में आग की लपटें नजर आ रही थीं। बकौल शाह, वे 1 मार्च को मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचे, जहां नरेंद्र मोदी के साथ तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस भी थे। उनसे आग्रह पर सेना को गाड़ियों के साथ ही अन्य संसाधन उपलब्ध कराए गए। शाह के मुताबिक सेना ने 48 घंटों में दंगों पर पूरी तरह से काबू पा लिया था जबकि गुजरात पुलिस तमाशाई बनी हुई थी या एकपक्षीय कार्रवाई कर रही थी।

Share This Post

Post Comment