समर्पण, प्रेम और आज्ञाकारिता का आधार देकर अपने व्यक्तित्व को उज्जवल बनाए

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दिल्ली, अरविंद यादव : गुरु पूर्णिमा महोत्सव, पूर्ण आध्यात्मिक सतगुरु को कृतज्ञता अर्पित करने का त्यौहार है, जो गुरु के सम्मान में मनाया जाता है। यह त्यौहार हिंदू कैलेंडर के अनुसार अषाढ़ माह की पहली पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। एक शिष्य के जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। गुरु के प्रति प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है। वर्ष भर इस पावन पर्व की प्रतीक्षा करने वालों को यह त्यौहार आनंद प्रदान करता है। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के दिव्य धाम आश्रम, नई दिल्ली में गुरु पूर्णिमा का यह उत्सव मनाया गया जिसमें हजारों की तादात में श्रद्धालुओं, उपासकों ने अपनी उपस्थिति दे कर गुरु चरणों में अपने भावों को अर्पित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ सतगुरु भगवान के श्री चरणों में अभिवादन के साथ किया गया जिसके बाद पावन ‘आरती’ का गायन भी किया गया। विभिन्न भक्तिपूर्ण, सुन्दर भजनों का श्री गुरुदेव का स्मरण करते हुए गायन किया गया। संस्थान के अनेक प्रचारकों ने गुरु भक्ति के पथ पर दृढ़तापूर्वक निरंतर बढ़ते रहने पर प्रेरणादायक विचारों व भजनों को गुरु भक्तों के समक्ष रखे। यह दिवस सतगुरु और उनके शिष्यों के बीच स्थापित शाश्वत संबंध पर प्रकाश डालता है। हृदय की गहराइयों से एक शिष्य द्वारा अपने पूर्ण सतगुरु के प्रति आभार व्यक्त करने का यह एक सुअवसर है। इसके माध्यम से शिष्य अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों के प्रति और अधिक सतर्क होता है। साध्वी जी ने बताया कि ‘गुरु’ शब्द दो शब्दों के मेल से उत्पन्न हुआ है. ‘गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ अर्थात प्रकाश। जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए, यानि जो हमें दिव्यप्रकाश का दर्शन करा अज्ञानता के अंधेरे से दूर ले जाते है वही पूर्ण सतगुरु है। श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा से लाखों ईश्वर जिज्ञासुओं ने ईश्वरीय अनुभूतियों का भीतर ही अनुभव कर स्वयं के आंतरिक साम्राज्य की यात्रा शुरू की है। यह केवल गुरु हैं जो अज्ञानता की गहरी खाई से एक इंसान को बाहर निकाल सकते हैं, क्योंकि केवल उनके माध्यम से ही एक व्यक्ति ईश्वरीय ज्ञान की उपलब्धि के बाद अपने पूरे जीवन को उजागर कर पाता है। परन्तु जहाँ बात एक ‘आदर्श शिष्य’ बनने की है, तो उसमें तो शिष्य यानी आपकी भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि गुरु तो मेघ के समान सब पर समान कृपा बरसाते हैं। पर इस बरखा को आधार या पात्र कैसा मिल रहा हैं, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। जैसे कि स्वाति नक्षत्र की बूंद यदि ज़मीन पर गिरती है, तो धूल में मिल जाती है, केले के पत्ते का स्पर्श पाती हैं, तो कपूर का रूप ले लेती है। वहीं यदि यह सर्प के मुंह में गिर जाए, तो विष बन जाती है और सीप के मुख में समा जाए, तो मोती रूप हो जाती है। इसी प्रकार यह आप पर निर्भर करता है कि आप गुरु कृपा रुपी स्वाति बूंद को किस तरह संजोते हैं? कैसी भावना या कितने पुरुषार्थ का आधार देते हैं? यदि मनमुख होकर आप इस मार्ग पर चलते हैं, तो गुरु कृपा या तो धूल में मिल जाती है या उसे पाकर आपके भीतर अहं का विष उत्पन्न हो जाता है। पर यदि आप उसे समर्पण, प्रेम और आज्ञाकारिता का आधार देते हैं यानी गुरु की रज़ा में रहकर उनकी आज्ञा में चलते हैं, तो निःसन्देह गुरु की कृपा आपके व्यक्तित्व को मोती सा उज्जवल बना देती है। आप एक आदर्श शिष्य बनकर चमक उठते हैं।

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