ईश्वर ‘दर्शन’ का विषय है : श्री आशुतोष महाराज जी

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दिल्ली, अरविंद यादव : शास्त्र ग्रन्थ एक ‘आह्रान!’ है! एक ऊर्जावान पुकार है उस समाज के प्रति जो ईश्वर के संबंध में विभिन्न प्रकार की धारणाएं रखते है। अगर हम ईश्वर संबंधी मनोविज्ञान के आधार पर समाज को वर्गीकृत करें तो मुख्यतौर पर दो वर्ग उभर कर सामने आते हैं, नास्तिक और आस्तिक और ये दोनों वर्ग हमेशा से ही समाज में रहे हैं। नास्तिक वे हैं, जो ईश्वर के अस्तित्व को ‘नहीं मानते’। आस्तिक वे हैं, जो ईश्वर के अस्तित्व को ‘मानते हैं’। यदि हम संत महापुरुषों की जीवनी व धर्म ग्रंथों का गंभीरता से विश्लेषात्मक अध्ययन करें तो आस्तिकों को फिर से दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। पहला वर्ग वह जो ईश्वर को मानने के साथ.साथ जानता भी है। दूसरा वर्ग वह जो ईश्वर की सत्ता को केवल मानता  है पर जानता नहीं। इस दूसरे वर्ग ने ईश्वर का ‘पूजन-वंदन’ तो किया है पर प्रत्यक्ष ‘दर्शन’ नहीं। इन्होंने ईश्वर पर चर्चाए पठन.पाठन, व्याख्यान किया है पर उसकी अनुभूति या साक्षात्कार नहीं। इन दूसरे प्रकार के आस्तिकों की संख्या पहले वर्ग की तुलना में बहुत अधिक है। इसका बहुत बड़ा कारण यह है कि आज ईश्वर के संबंध में एक भ्रांत धारण प्रचलित है। वह यह कि ईश्वर ऐसा पारलौकिक तत्व है जिसे देखा ही नहीं जा सकता। ईश्वर पवन के समान अदर्शनीय है केवल महसूस करने का विषय है। इन्हीं भ्रांतियों के चलते ईश्वरीय सत्ता समाज के लिए केवल सिद्धान्तों व भावों का पुलिंदा भर या कर्मकाण्डों की उत्प्रेरक बनकर रह गई जबकि आदिकाल से समस्त तत्त्व ज्ञानियों ने ईश्वर के विषय में एक महत्त्वपूर्ण परिभाषा दी ‘परमात्मा’ दर्शन या देखे जाने का विषय है वह प्रत्यक्ष रूप से अनुभवगम्य है।’

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