नेता जी सुभाषचंद्र बोस की यादें

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दिल्ली, राहुल मालपानी : बचपनकाल मे मेरे एक टीचर आन्ध्र प्रदेश के आदरणीय राव साहब जी थे जो मेरे प्रिंसिपल साहब के गुरू थे। उनकी विद्वता का कोई जबाव नही था करीब पाॅच विषयो मे पोस्ट ग्रेजुएट थे लेकिन ब्रिटिस शासन मे अगर पकडे जाते तो उनपर युद्ध बन्दी कानूनो के तहत अरेस्ट कर लिया जाता इसीलिए छुपकर एक छोटी सी ग्रामीण क्षेत्र मे रहे। हमारे प्रिंसिपल साहब काफी प्रभावशाली राजपूत थे और जनसंघी थे जो उनकी सुरक्षा का भार लिए हुए थे। पूज्य राव साहब आजाद हिन्द फौज मे रहे और सुभाष बाबू के पीए रह चुके थे सुभाष बाबू का जिक्र होते ही उनकी आॅखो से गंगा जमुना की धारा बहने लगती हलाकि बडे फौलादी कलेजे वाले थे और उन्ही के संस्कार दिए हुए हम बच्चे भी फौलादी हो गये। भारत स्वतंत्र होने के बाद भी यदि नेहरू सरकार को उनका पता चल जाता तो अंग्रेजो के सुपुर्द कर देते ऐसी सन्धि थी। लेकिन दूर दराज के इन्टीरियर इलाके मे किसको पता था उनके बारे मे। वही राव साहब अक्सर नेताजी की बाते सुनाते रहते थे उनके खान पान रहन सहन और व्यक्तिगत बाते बताते और भावुक हो जाते थे लेकिन यदि कोई उनकी मृत्यु हो गयी ऐसी बाते करता तो बहुत चिढ जाते और खूब फटकारते अपशब्द भी बोल देते उनका कहना था हमारे नेताजी अभी जिन्दा है उस घटना मे वह बच गये थे। एक बार गुमनामी बाबा की फोटो छपी थी अखबार मे उसको देख देख कर खूब रोए और कहा था यही है हमारे नेताजी यही है लेकिन उनकी उम्र भी काफी हो गयी थी और कानून का डर था इसलिए हमारे प्रिंसिपल साहब उनको जाने नही दिए। नेताजी के कई संस्मरण मुझे आज भी खूब याद है फिर कभी बताऊगा लेकिन बाल्यकाल मे ही हम लोग नेताजी से इतने प्रभावित हुए कि उनको अपना आदर्श महापुरूष मानने लगे। कल मैने अपने प्रिय नेताजी का यूनिफार्म देखा तो भाव विह्वल हो उठा और सोचा अपने दोस्तो को भी थोडा बताएं “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूॅगा” जय हिन्द।

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