विलुप्त हो रहे कंद-मूलों को संरक्षित कर रोजी जुटा रहे आदिवासी

गोंड़ा, उत्तर प्रदेश/नगर संवाददाताः आदिमानव से मानव बनने की प्रक्रिया में कंद- मूलों की खासी अहमियत थी। हमारे पूर्वजों ने इनका भरपूर इस्तेमाल किया। लेकिन अब आदिवासियों ने भी इन्हें भुला दिया है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में धरती पर पानी इतना कम बचेगा कि गेहूं, धान जैसी फसलें उगाना इंसान के बूते की बात नहीं रह जाएगी। तब क्या होगा?  वैज्ञानिकों का कहना है कि तब इंसान को ऐसे अनाजों और खाद्यों की ओर रुख करना होगा, जिनमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और ऊर्जा का पर्याप्त संचय हो। साथ ही ये बिना पानी या कम पानी के भी उपज सकें। दरअसल, यह इशारा अब प्रचलन में नहीं रहे मोटे अनाजों और कंद-मूलों की ओर ही है। इन्हें फ्यूचर फूड यानी भविष्य के खाद्य कहा जा रहा है। और कहा जा रहा है कि हमें इनकी ओर लौटना शुरू कर देना चाहिए। झारखंड के पहाड़िया आदिवासियों ने समय रहते शुरुआत कर दी है। गोड्डा के सुंदपहाड़ी प्रखंड के पहाड़िया परिवारों ने लगभग विलुप्त हो चुके 200 कंद-मूलों को खोज निकाला है। अब वे इनके संरक्षण में जुट गए हैं। यह प्रयास इन आदिवासियों को रोजी-रोटी भी मुहैया करा रहा है। इसकी प्रेरणा इन्हें एक सुशिक्षित युवक ने दी। कोलकाता निवासी सौमिक बैनर्जी ने इन्हें समझाया कि इन कंद-मूलों का सेवनपूर्वज आदिवासियों ने लंबे समय तक किया और आत्मनिर्भर बने रहे। आज गेहूं, धान खरीदने के लिए आदिवासियों को संघर्ष करना पड़ रहा है, जबकि ये उनका मुख्य आहार कभी नहीं थे। सौमिक की प्रेरणा से पहाड़िया परिवारों ने संताल पहाड़ पर कंद-मूलों की खोज शुरू कर दी। अब तक वे करीब 200 कंद-मूल खोज चुके हैं और इनका संरक्षण कर रहे हैं। सौमिक ने एमएससी करने के बाद भारतीय वन प्रबंधन संस्थान से डिग्री हासिल की। 2001 में नौकरी शुरू की। लेकिन 2009 में नौकरी छोड़कर यहां चले आए। तब से पहाड़िया परिवारों के सुख-दुख के साथी हैं। आदिवासियों के साथ मिलकर विलुप्त हो रहे कंद-मूलों की पहचान कर उनके संरक्षण का उपाय करने में जुटे हुए हैं। सौमिक ने बताया कि पहाड़ों पर सैकड़ों प्रकार के अनाज व कंद-मूल हैं, जो लुप्त होने की कगार पर हैं। आदिवासी भी चावल व गेहूं को ही मुख्य खाद्य मानने लगे हैं। इसलिए परंपरागत अनाज पर ध्यान नहीं दे रहे। जबकि इन्हें सहेजने की जरूरत है। सौमिक की प्रेरणा से अब ये आदिवासी जगह-जगह खाद्य मेला लगाते हैं। इसमें स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले अनाज व कंद-मूल की प्रदर्शनी लगती हैं। लोगों को कम दामों पर इन्हें बेचते हैं और इस मुहिम से जुड़ने की उनसे अपील करते हैं। सौमिक ने बताया कि संकर यानी हाइब्रिड बीजों से शुद्ध प्रजाति के बीज बेहतर होते हैं। संकर बीज का उत्पाद खाने से पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है। वे अनाजों के मूल को ही बेहतर मानते हैं। मड़ुआ, कोदो, सामा, पिसुआ, कौनी, अलसी, मक्का, गेहूं, अरहर समेत अनेक प्रकार की शुद्ध प्रजातियों के बीज के संरक्षण में लगे हैं। पहाड़ों पर कंदा, अलती, नाते, पागरो, तालको, अच्चो समेत दो सौ प्रकार के कंद पाए जाते हैं। इनको चुनते हैं और गांववालों को इन्हें नई पौध लगाकर संरक्षित करने को प्रेरित करते हैं। गांव के लोग उनकी बात मान अपनी इस धरोहर को सहेज रहे हैं।

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