फिर से पटरी पर लौट रही है अर्थव्यवस्था, अच्छे दिनों के उभरे आसार

नई दिल्ली/नगर संवाददाताः वर्ष 2017 के शुरू में पर जो काले बादल छा गए थे, वे धीरे-धीरे छंट रहे हैं। आर्थिक सुधार के लिए उठाए गए महत्वपूर्ण कदम चुनौतियों से भरे थे। नवंबर 2016 में नोटबंदी और जुलाई 2017 में जीएसटी के तात्कालिक प्रभाव दु:खदायी थे, इसमें संदेह नहीं, किन्तु जनता ने सरकार का साथ दिया। कड़वा घूंट पीकर भी उसमें विश्वास बनाए रखा जो इस वर्ष हुए चुनावों में परिलक्षित हुए। अधिकांश आर्थिक सूचकांक इस बात के संकेत दे रहे हैं कि पुन: पटरी पर लौट रही है। 26 दिसंबर 2017 को शेयर बाजार का बीएसई इंडेक्स 34,000 के ऊपर चला गया जो एक कीर्तिमान है। देश के संस्थागत निवेशकों ने 91 हजार करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 48 हजार करोड़ रुपये से अधिक भारतीय शेयर बाजारों में लगाए। एक वर्ष के अंदर इतना निवेश पूंजी बाजार के लिए ऐसे समय में खुशियां लाया जब मांग घट रही थी। उत्पादन में गिरावट आ रही थी और में मंदी की स्थिति बनी हुई थी। कंपनियों का रहतिया बढ़ता जा रहा था, सप्लाई चेन सूख रहा था, निर्यात घट रहा था, आयात बढ़ रहा था, चालू खाते का घाटा बढ़ता जा रहा था। अप्रैल-जून 2017 की तिमाही में विकास दर 5.7 प्रतिशत पर आ गया जो पिछली तीन तिमाहियों से सबसे कम दर था। जुलाई-सितंबर की तिमाही में उम्मीद नजर आई जब विकास दर 6.3 प्रतिशत पर गया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और ओईसीडी के अनुमान के अनुसार 2017 के पूरे वर्ष का विकास दर 6.7 प्रतिशत होने की संभावना है जबकि विश्व बैंक सात प्रतिशत संभावित मानता है। तिमाही जुलाई-सितंबर में कुल पूंजीगत वृद्धि 4.4 प्रतिशत हुई जो इसके पहले की तिमाही में मात्र 1.6 प्रतिशत थी। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने 13 वर्षो के अंतराल के बाद पहली बार भारत की सावरेन रेटिंग बढ़ायी। एजेंसी का अनुमान है कि 2018 में विकास दर 7.1 प्रतिशत होगी। फिक्की के अनुसार औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि होनी शुरू हो गई है और 2018 में गति तेज होगी। लंदन स्थित सेंटर फार इकोनॉमिक्स एवं बिजनेस रिसर्च के अनुसार भारत 2018 मे इंग्लैंड और फ्रांस को पीछे छोड़कर विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाएगा। थोड़े समय के लिए नीचे गई किन्तु अब ऊपर आने लगी है। सस्ती ऊर्जा और डिजिटल क्रांति भारतीय को गति देंगे। इस सेंटर के अनुसार 2030 तक चीन अमेरिका से आगे निकल जाएगा और भारत 2050 तक चीन से भी आगे निकल सकता है। नए वर्ष 2018 में विकास दर 7 प्रतिशत से ऊपर ले जाने के लिए औद्योगिक और कृषि उत्पादन में वृद्धि और सेवा क्षेत्र के विस्तार की आवश्यकता होगी, साथ ही कीमतों की बढ़त को रोकना होगा। विदेशी निवेशकों के लिए भारत में उत्पादन और व्यापार करना और आसान होगा। बढ़ती आबादी पर नियंत्रण और रोजगार के अवसर बढ़ाने की जो योजनाएं बनाई गई हैं उनके कार्यान्वयन में तेजी लानी होगी। अधिकांश योजनाओं को उतनी सफलता नहीं मिली है जो अपेक्षित थी। बुनियादी ढांचे को तेजी से विकसित करना होगा। निर्यात में शिथिलता को रोकना होगा। 2017 के मध्य में मैन्युफैक्चरिंग के विकास का सूचकांक 1.2 प्रतिशत पर आ गया जो पिछले वर्ष 10.7 प्रतिशत था। छोटे और बड़े सभी उद्योग दुष्प्रभावित हुए। पहले करेंसी की कमी के कारण और बाद में जीएसटी के बढ़े रेट और हिसाब रखने और टैक्स जमा करने की जटिल प्रक्रिया की वजह से, जिससे अधिकांश व्यापारी परेशान हुए, विशेष रूप से लघु और मध्यम क्षेत्र के उत्पादक व व्यवसायी जो अब तक कठिनाइयां ङोल रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने तो नोटबंदी को एक वैधानिक लूट तक की संज्ञा दे डाली और कहा कि इससे विकास दर 2 प्रतिशत नीचे जाएगी। बैकिंग व्यवस्था पर जनता का विश्वास उठ जाएगा। हालांकि स्थिति इतनी निराशाजनक तो नहीं हुई, किन्तु अर्थशास्त्री पीएम को हल्के से लेना भी देशहित में नहीं है। आर्थिक सुधार की योजनाओं के क्रियान्वयन में अधिक सतर्कता एवं कुशल प्रशासन का भी उतना ही महत्व है जितना अच्छी नीतियां और योजनाएं बनाना, जीएसटी के रेट अभी भी पुनर्विचार के योग्य हैं, हालांकि सरकार ने 300 वस्तुओं पर टैक्स कुछ कम किए हैं। प्रक्रिया में सरलीकरण की बड़ी आवश्यकता है जिस पर दुर्भाग्यवश सरकार का ध्यान उतना नहीं जा रहा है जितना अपेक्षित है। औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के लिए वातावरण बनाना सरकार की जिम्मेदारी है, देशी निवेशक अभी भी बैंकों से उतना धन निवेश के लिए नहीं उठा रहे हैं जो अपेक्षित है। विकास दर को आगे जाने के लिए 2018 में मैन्युफैरिंग क्षेत्र के विकास का लक्ष्य कम से कम 10 प्रतिशत का होना चाहिए जो बड़े आर्थिक सुधारों के कारण नीचे आ गया है। कृषि उत्पादन अब भी मानसून की कृपा पर निर्भर है। 2017 में देश के अधिकांश भागों में वर्षा औसत रही। कुछ भागों में सूखे का असर था, लेकिन कुल मिलाकर कृषि उत्पादन पर संकट नहीं आया। देश के कुछ हिस्सों में अभी भी सिंचाई की सुविधाओं का नितांत अभाव है। प्रधानमंत्री की सिंचाई योजना अभी तक उन क्षेत्रों में नहीं पहुंच पायी है। बड़ीं संख्या में देश के किसान अभी भी साहूकारों के कर्ज से दबे रहते हैं। आए दिन किसानों द्वारा आत्म हत्या के समाचार आते हैं जो फसल खराब होने और कर्ज न चुकाने के कारण होते हैं। 2017 में कुछ राज्यों में किसानों के कर्ज माफी के एलान हुए हैं जिसे अच्छा कदम माना जाएगा। जहां उद्योगपति बैंकों से अरबों रुपये लेकर डकार जाते हैं और फरार हो जाते हैं वहीं थोड़े से रुपयों के लिए किसान आत्म हत्या करने को मजबूर हो जाते हैं। इस स्थिति में बदलाव होना चाहिए। कृषि पदार्थो के आयात पर सरकार की नति स्पष्ट होनी चाहिए। बहरहाल भारत नवयुवकों का देश है। इतनी बड़ी आबादी को लाभप्रद रोजगार के लिए विकास दर को तेज करना होगा। 2018 के लिए नई उम्मीदें लेकर आ रहा है। आशा है फरवरी में आने वाले बजट में इसकी एक झलक देखने को मिलेगी।

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