प्रभु श्रीराम ने बताया आदर्श राज्य कैसा हो – साध्वी श्रेया भारती

प्रभु श्रीराम ने बताया आदर्श राज्य कैसा हो – साध्वी श्रेया भारती

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा चिराग दिल्ली में आयोजित सात दिवसीय श्री राम कथामृत के अंतिम दिवस में सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या कथा व्यास साध्वी श्रेया भारती जी ने रामराज्य प्रसंग को बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया। समस्त रामायणों के समन्वय से युक्त इस श्री राम कथा में अनेकों ही दिव्य रहस्यों का उद्घाटन किया गया, जिनसे आज लोग पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। उन्होंने बताया कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के मार्गदर्शन में अयोध्या का राज्य सभी प्रकार से उन्नत था। लेकिन क्या यही राम राज्य की वास्तविक परिभाषा है? तो इसका जवाब है नहीं। अगर यही रामराज्य की सही परिभाषा है तो लंका भी तो भौतिक सम्पन्नता, समृद्धि, ऐश्वर्य, सुव्यवस्थित सेना में अग्रणी थी। परन्तु फिर भी उसे राम राज्य के समतुल्य नहीं कहा जाता क्योंकि लंकावासी मानसिक स्तर पर पूर्णता अविकसित थे। उनके भीतर आसुरी प्रवृत्तियों का बोलबाला था। वहाँ की वायु तक में भी अनीति, अनाचार और पाप की दुर्गन्ध थी। जहाँ चारों ओर भ्रष्टाचार और चरित्राहीनता का ही सम्राज्य फैला हुआ था। राम के राज्य की बात सुनते ही अकसर मन में विचार आते हैं कि राम राज्य आज भी होना चाहिये। पर विचारणीय बात है कि राम राज्य की स्थापना होगी कैसे? जिस राम के विषय में तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में बड़े विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने अपने राज्य के माध्यम से बता दिया कि एक आदर्श राज्य कैसा होना चाहिये। जहाँ एक आदर्श राजा शासन कर रहा हो। राम के राज्य मेंहर इन्सान धर्म संयुक्त आचरण करता था। श्रुति नीति भाव शास्त्रों में जो जीवनचर्या की नीति थी जैसा आचरण करने को लिखा था वैसा ही आचरण था सबका। राम जीके सम्पूर्ण शासन व्यवस्था का आधार क्या था? धर्म! वह स्वयं मूर्तिमान धर्म है और उनके राज्य में हर जगह हर व्यक्ति हर वस्तु में एक चीज परिलक्षित हो रही है धर्म। राम राज्यमें अपराधिक प्रवृत्तियाँ नहीं थी। अपराधिक प्रवृत्तियों का जन्म कहाँ होता है। ठीक वैसे जैसे आप खड़ा पानी छोड़ देते हैं तो वह सड़ता रहता है। उसके सड़ने मात्र से उसमें मक्खी, मच्छर और कीटाणु पनपने लगते है। ठीक हमारा मन भी ऐसे है, अगर इसमें खड़े पानी की तरह कुछ आसक्तियां और वासनायें शेष रह जायें, हमारे स्वार्थ से पूरित हों तो वहीं स्वार्थ जनित ऐसी भावनाओं का पोषण होता है। जो हमारे भीतर विपरीतिक मानसिकताओं और अपराधिक प्रवृत्तियों को जन्म देती है। लेकिन अगर मन में कोई विकृति ही नहीं है विचारों का खड़ा पानी ही नहीं है तो फिर अपराधिक प्रवृत्तियों को कोई आधार ही नहीं मिलता। इसलिये जो राम राज्य के लक्षण बताये कि वहाँ श्रुतियों के अनुसार आचरण करने वाले लोग थे और धर्म आचरण में उतरे हुये थे। तब बुराई का स्थान ही कहाँ? इसीलिये कहा उस राम के राज्य में समाज के सुधार के लिये कोई दंड न्याय व्यवस्था की आवश्यक्ता नहीं है। साध्वी जी ने कहा कि राम राज्य के आधार-श्री राम थे जो बह्मज्ञानी थे। यही कारण था कि वो अपनी प्रजा के हितों का ध्यान रखते थे। उन्होनें अपनी प्रजा के साधारण लोगों को भी कभी अनदेखा नहीं किया। सब के लिए समान व्यवस्था थी, उनकी नज़र में कोई भी आपेक्षित नहीं था। इसलिए हमारे महापुरूषों ने कहा कि राजा को ब्रह्मज्ञानी होना चाहिए या फिर किसी ब्रह्मज्ञानी को राजा बना दो। वर्तमान समय में भी यदि हम ऐसे ही अलौकिक राम राज्य की स्थापना करना चाहतें हैं, तो सर्व प्रथम प्रभु राम को जानना होगा। प्रभु राम का प्राकट्य अपने भीतर करवाना होगा परन्तु हम अपनी संकीर्ण बुद्धि एवं लौकिक इन्द्रियों से त्रेता के इस युग-प्रणेता को नहीं जान सकते। वे केवल अयोध्या के ही आदर्श संचालक नहीं थे, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के नियामक तत्त्व हैं। ऐसे ब्रह्मस्वरूप श्री राम जी को केवल ब्रह्मज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है। श्री राम हमारे हृदय में निवास करते हैं और उनका दर्शन केवल दिव्य नेत्र द्वारा होता है। जिसके बारे में हमारे सभी धार्मिक शास्त्रों में बताया गया है। भारती जी ने बताया यूँ तो दिव्य नेत्र हम सभी की भृकुटी के बीच में स्थित है। परंतु जब तक हमें एक पूर्ण सद्गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती तब तक हम ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकते। सद्गुरु दीक्षा देते समय इस दिव्य नेत्र को खोल देते है। जिसके खुलते ही जिज्ञासु अपने भीतर ईश्वर के वास्तविक रूप का प्रत्यक्ष दर्शन करता है। जब भीतर हृदय के सिंहासन पर राम विराजमान होते हैं, तब राम राज्य की स्थापना होती है।

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