राजनीति के चरित्र पर न लगे दाग, दागी नेताओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

नई दिल्ली/नगर संवाददाताः नेताओं पर आपराधिक मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त हो गया है। अदालत ने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मुकदमे निपटाने के लिए स्पेशल कोर्ट के गठन का आदेश दिया है। कोर्ट ने सरकार से कहा है कि स्पेशल कोर्ट बनाने के लिए फंड और संसाधनों की पूरी योजना दाखिल करे। साथ ही कोर्ट ने टिप्पणी की है केंद्र एक ओर तो स्पेशल कोर्ट बनाने का बात करता है और दूसरी ओर कहता है कि यह राज्यों का मामला है। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा है कि 2014 के आंकड़ों के मुताबिक जनप्रतिनिधियों के खिलाफ जो 1,581 मामले दर्ज किए गए, उनका क्या हुआ। अदालत ने इन मामलों के जल्द निपटारे के लिए केंद्र को विशेष अदालतों के गठन का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि इन विशेष अदालतों का गठन फास्ट ट्रैक कोर्ट की तर्ज पर किया जाए ताकि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ चल रहे मामलों का जल्द निपटारा हो सके। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में सरकार से कहा है कि वह स्पेशल कोर्ट बनाने के लिए अनुमानित खर्च और संसाधनों की पूरी योजना पेश करे। अदालत ने सरकार को यह सभी जरूरी जानकारी देने के लिए छह हफ्ते का समय दिया है। इस मामले से जुड़ी अगली सुनवाई 13 दिसंबर को होगी। राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को ठीक से समझने के लिए अध्येताओं ने उसे दो श्रेणियों में बांटा है। सरकारी पद पर रहते हुए उसका दुरुपयोग करने के जरिये किया गया भ्रष्टाचार और राजनीतिक या प्रशासनिक हैसियत को बनाए रखने के लिए किया जाने वाला भ्रष्टाचार है। पहली श्रेणी में निजी क्षेत्र को दिए गए ठेकों और लाइसेंसों के बदले लिया गया कमीशन, हथियारों की खरीद-बिक्री में लिया गया कमीशन, फर्जीवाड़े और अन्य आर्थिक अपराधों द्वारा जमा की गई रकम, टैक्स-चोरी में मदद और प्रोत्साहन से हासिल की गई रकम, राजनीतिक रुतबे का इस्तेमाल करके धन की उगाही, सरकारी प्रभाव का इस्तेमाल करके किसी कंपनी को लाभ पहुंचाने और उसके बदले रकम वसूलने और फायदे वाली नियुक्तियों के बदले वरिष्ठ नौकरशाहों और नेताओं द्वारा वसूले जाने वाले अवैध धन जैसी गतिविधियां पहली श्रेणी में आती हैं। दूसरी श्रेणी में चुनाव लड़ने के लिए पार्टी फंड के नाम पर उगाही जाने वाली रकमें, वोटर को खरीदने की कार्रवाई, बहुमत प्राप्त करने के लिए विधायकों और सांसदों को खरीदने में खर्च किया जाने वाला धन, संसद-अदालतों, सरकारी संस्थाओं, नागर समाज की संस्थाओं और मीडिया से अपने पक्ष में फैसले लेने या उनका समर्थन करने के लिए खर्च किए जाने वाले संसाधन और सरकारी संसाधनों के आवंटन में किया जाने वाला पक्षपात आता है। राजनीतिक-प्रशासनिक भ्रष्टाचार को समझने के लिए जरूरी है कि इन दोनों श्रेणियों के अलावा एक और विभेदीकरण किया जाए। यह है शीर्ष पदों पर होने वाला बड़ा भ्रष्टाचार और निचले मुकामों पर होने वाला छोटा-मोटा भ्रष्टाचार। सूजन रोज एकरमैन ने अपनी रचना ‘करप्शन एंड गवर्नमेंट: कॉजिज़, कांसिक्वेसिंज एंड रिफॉर्म’ में शीर्ष पदों पर होने वाले भ्रष्टाचार को ‘क्लेप्टोक्रैसी’ की संज्ञा दी है। किसी भी तंत्र के शीर्ष पर बैठा कोई बड़ा राजनेता या कोई बड़ा नौकरशाह एक निजी इजारेदार पूंजीपति की तरह आचरण कर सकता है। हालांकि एकरमैन ने भारत के उदाहरण पर न के बराबर ही गौर किया है, पर भारत में सार्वजनिक संस्थाओं के मुखिया अफसरों को ‘सरकारी मुगलों’ की संज्ञा दी जा चुकी है। न्यायाधीशों द्वारा किए जाने वाले न्यायिक भ्रष्टाचार की परिघटना भारत में अभी नई है, लेकिन उसका असर दिखाई देने लगा है। दूसरी तरफ भारतीय उदाहरण ही बताता है कि भ्रष्टाचार का यह रूप न केवल शीर्ष पदों पर होने वाली कमीशनखोरी, दलाली और उगाही से जुड़ता है, बल्कि दोनों एक-दूसरे को शह देते हैं। पिछले तीस-पैंतीस वर्षो से भारतीय लोकतंत्र में राज्य सरकारों के स्तर पर सत्तारूढ़ निजाम द्वारा अगला चुनाव लड़ने के लिए नौकरशाही के जरिये नियोजित उगाही करने की प्रौद्योगिकी लगभग स्थापित हो चुकी है। इस प्रक्रिया ने क्लेप्टोक्रैसी और सुविधा शुल्क के बीच का फर्क को काफी हद तक कम कर दिया है। भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में चुनाव लड़ने और उसमें जीतने-हारने की प्रक्रिया अवैध धन के इस्तेमाल और उसके चलते भ्रष्टाचार का प्रमुख स्नोत बनी हुई है। यह समस्या अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण के दिनों में भी थी, लेकिन बाजारोन्मुख व्यवस्था के जमाने में इसने पहले से कहीं ज्यादा भीषण रूप ग्रहण कर लिया है। एक तरफ चुनावों की संख्या और बारम्बारता बढ़ रही है, दूसरी तरफ राजनेताओं को चुनाव लड़ने और पार्टियां चलाने के लिए धन की जरूरत। नौकरशाही का इस्तेमाल करके धन उगाहने के साथ-साथ राजनीतिक दल निजी स्नोतों से बड़े पैमाने पर खुफिया अनुदान प्राप्त करते हैं। यह काला धन होता है। बदले में नेतागण उन्हीं आर्थिक हितों की सेवा करने का वचन देते हैं। निजी पूंजी न केवल उन नेताओं और राजनीतिक पार्टियों की आर्थिक मदद करती है जिनके सत्ता में आने की संभावना है, बल्कि वह चालाकी से हाशिये पर पड़ी राजनीतिक ताकतों को भी पटाये रखना चाहती है ताकि मौका आने पर उनका इस्तेमाल कर सके। राजनीतिक भ्रष्टाचार के इस पहलू का एक इससे भी ज्यादा अंधेरा पक्ष है। एक तरफ संगठित अपराध जगत द्वारा चुनाव प्रक्रिया में धन का निवेश और दूसरी तरफ स्वयं माफिया सरदारों द्वारा पार्टियों के उम्मीदवार बन कर चुनाव जीतने की कोशिश करना। इस पहलू को राजनीति के अपराधीकरण के रूप में भी देखा जाता है। एक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देशों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व (जैसे अमेरिकी चुनावी प्रणाली), दूसरी- फर्स्ट-पास्ट-दि-पोस्ट (जैसे भारतीय चुनावी प्रणाली) के मुकाबले राजनीतिक भ्रष्टाचार के अंदेश से ज्यादा ग्रस्त होता है। इसके पीछे तर्क दिया गया कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से सांसद या विधायक चुनने वाली प्रणाली ताकतवर राजनीतिक दलों को प्रोत्साहन देती है। इन पार्टियों के नेता राष्ट्रपति के साथ जिसके पास इस तरह की प्रणालियों में काफी कार्यकारी अधिकार होते हैं, भ्रष्ट किस्म की सौदेबाजियां कर सकते हैं।

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