रामगंज का मामला देख याद आई नायक फिल्म

जयपुर, राजस्थान/विकास शर्माः राजधानी के रामगंज थाने में बीते दिनों में हुए शर्मनाक हादसे ने शहर को एक बार फिर नायक फिल्म की याद दिला दी, जहां सरकार को हादसे को लेकर उपद्रवियों के खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए थी बजाए उसके अपने चंद वोटों की राजनीति के चक्कर में एक बार फिर सफेदपोश नेताओं ने खाकी को सूली पर चढ़ा कर खाकी के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने का काम किया है। सरकार में बैठे यह सफेदपोश नेता सिर्फ इतना ही जानते हैं कि शहर में आग लगती है तो लगने दो, कोई मरता है तो मरने दो, अपना वोट बैंक कम नहीं होना चाहिए। मामला किसी समुदाय, धर्म या फिर जाति को लेकर नहीं है मामला है तो स्वाभिमान का, शहर में शांति व्यवस्था का, फिर क्यों हर बार खाकी को ही बलिदान देना पड़ता है और आखिर कब तक देना पड़ता रहेगा। पुलिस सुख-सुविधाओं का त्याग है। पुलिस अनुशासन का विभाग है। पुलिस, पुलिस देश भक्ति व जनसेवा का नारा है, पुलिस अमानवता से पीड़ितों का सहारा है। पुलिस, पुलिस नियम कानून की परिभाषा है, पुलिस अपराधों का गहन अध्ययन है जिज्ञासा है। पुलिस, पुलिस अमन व शांति का सबूत है, पुलिस अपराधियों के डरावने सपने का भूत है। पुलिस, पुलिस है तो देखो कितनी शांति है, पुलिस नहीं तो चाराें तरफ क्रांति है। पुलिस, पुलिस जनता की सेवा के लिए त्योहार व परिवार छोड़ देती है, और पुलिस की पत्नी करवा चौथ का व्रत फोटो देखकर तोड़ देती है। पुलिस, पुलिस कभी ठंड में ठिठुरती तो कभी गर्मी में जल जाती है। फिर भी उसे परिवार के लिए एक दिन की छुट्टी नहीं मिल पाती है। पुलिस, पुलिस त्याग है तपस्या है साधना है। पुलिस जनता रूपी देवता की करती सेवा और आराधना है। जनता अक्सर ये क्याें भूल जाती है। कि गोली तो पुलिस भी अपने सीने पर खाती है। शहीद सिर्फ सीमा पर जवान नहीं होता,सैंकड़ों की संख्या में पुलिस भी देश के अंदर जान गंवाती है। अगर पुलिस अपनी सेवा से, अपने धर्म से  हटती है तो सिर्फ राजनीतिक मंच के कारण? मैं यह तो नहीं जानता कि ऐसा कब तक चलता रहेगा लेकिन जब तक स्वार्थी सफेदपोश नेताओं के हाथ में देश की कमान रहेगी तब तक यूं ही चलता रहेगा।

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