आत्मा का परमात्मा तक पहुँचने का साधन हैं मानव तन

Shri Ashutosh Maharaj Ji

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः चार्वाक जैसे भौतिकता ग्रस्त लोग आत्मा के अस्तित्व को नकार केवल देह को ही साध्य लक्ष्य मानते हैं। उनका कहना है कि जीवनप्रयन्त सुख से जिओ और कर्जा लेकर घी पियो। कल का विचार क्यों किया जाए, जब यह देह भस्म ही हो जाएगी? यह कथन स्पष्ट रूप से वक्ता की अल्पज्ञता को दर्शाता है। ऐसे ही विषयासक्त लोग मानव समाज को अनैतिकता व पतन की गहरी खाई में धकेलते हैं। आत्मा व परमात्मा के अनुभवों से कोंसों दूर, ये लोग देह को ही प्राथमिकता देने की भूल कर बैठते हैं। निःसंदेह का विश्राम-स्थल अग्नि है, परन्तु इसके भीतर अविनाशी आत्मा का विश्राम स्थल तो परमात्मा है। वस्तुतः इस परमात्मा रुपी वृहद लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह मानव तन आत्मा का माध्यम मात्र है। कोठिपनिषद् में कहा गया हैं कि यह शरीर एक रथ के समान हैं। आत्मा इसकी रथी हैं। जिस प्रकार रथ एक माध्यम हैं, जो रथ को उसके गंतव्य स्थान तक पहुँचाता है। उसी प्रकार मानव तन एक साधन हैं, जिसके द्वारा आत्मा, परमात्मा रुपी लक्ष्य तक पहुचँ पाती हैं। अध्यात्म सिद्ध तथ्यों को समाहित किए हुए है। जहाँ वह आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करते अनेकों तर्क देता है, वहीं आत्म-दर्शन की भी बात करता है। आत्मा को अनुभवगम्य बतला, उसके अस्तित्व को प्रयोगात्मक रूप से भी प्रमाणित करता है। बृहदार्नायक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रयी से कहते हैं – आत्मा श्रवणीय, माननीय, दर्शनीय और ध्यान किए जाने योग्य हैं। यह एक चेतन सत्ता हैं, जो सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म है। इसके शुभ्र ज्योतिर्मय रूप को देखना आज के विज्ञान के स्थूल यंत्रो द्वारा सम्भव नहीं है। इसको देखने के लिए अतिसूक्ष्म दिव्य दृष्टि की आवश्यकता हैं, जो एक तत्वदर्शी गुरु प्रदान करते हैं। अतः आत्मा के अस्तितिव का अंतिम व अकाट्य प्रमाण, ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर अंतर्जगत में उसका अनुभव ही है। ईश्वर या आत्मदर्शन वास्तव में दिव्य ज्योति का दर्शन है।

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