राखी महज़ कच्चा धागा नहीं

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः राखी मात्र धागा नहीं, बल्कि भावनाओं का पुलिंदा है। इसका रेशा-रेशा उच्च व पवित्र भावनाओं में गुथा है। यह इन भावनाओं में समाई महान शक्ति ही है जिसने राखी का महान क्रांतिकारी इतिहास रचा। खून का सम्बन्ध न होने पर भी, जान पर खेलकर राखी के व्रत को निभाने वाला उम्मेदसिंह, राखी के एक आह्वान पर, अपनी जान की परवाह किए बगैर, जंग-ए-मैदान में कूद पड़ा। राखी के महीन धागे की आन रखने के लिए, उसने फिरोजशाह की सेना की ईंट से ईंट बजा दी। उसे तितर-बितर कर उखाड़ फेंका और अपनी बहन पन्ना को उसका राज्य सही-सलामत वापिस सौंप दिया। जब भगवान विष्णु राजा बलि के द्वारपाल के रूप में अधीन हो गए, तब लक्ष्मी जी ने इसी धागे का सहारा लेकर अपने स्वामी को बलि की दासता से मुक्त कराया था। अतः इस सूत्र की अनुपम कथाएं हमारे पौराणिक इतिहास तक को गौरवान्वित करती हैं। इतना ही नहीं, इस धागे की विलक्षणता ने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास तक पर अपनी छाप छोड़ी है। जब स्वतंत्रता की रण चंडी भारत के बेटों से रक्त मांग रही थी तब इस देश की माता-बहनों ने सत्याग्रहियों की कलाइयों पर रक्षा का यही सूत्र बांधा था।

Shri Ashutosh Maharaj Ji - 3

उस समय यह सूत्र महज़ एक धागा नहीं, जाग्रति की धधकती मशाल साबित हुआ। जिसने अपनी लपटों की आंच से एक ही सन्देश प्रसारित किया- ‘हमारे वीर भाइयों! जैसे एक भाई बहन की असीमता की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा देता हैं, वैसे ही आज भारत माँ के लिए तुम अपने सिरों पर हिम्मत के कफ़न पहनकर शत्रुओं से जूझ पड़ो!!’ राखी को ‘रक्षा-बंधन’ भी कहा जाता है अर्थात एक ऐसा बंधन जिसमें दोनों ओर की रक्षा की कामना निहित है। बाँधने वाले की रक्षा की कामना तो है ही, बंधवाने वाले के लिए भी यह सूत्र एक अमोघ रक्षा कवच है। यही कारण है कि वैदिक काल में जब लोग ऋषियों के पास आशीष लेने जाया करते थे, तो ऋषि गण उनकी कलाइयों पर रक्षा-बंध बांधते थे। वैदिक मंत्रों से अभिमंत्रित मोली या सूत का धागा बांधकर उनकी रक्षा की मंगलकामना करते थे। सिर्फ बाँधने और बंधवाने वाले की रक्षा ही नहीं बल्कि समूचे भारत की संस्कृति की रक्षा इसमें छिपी है। आज भारत की संतानें एक ऐसे चौराहे पर जा खड़ी हुई हैं, जहां से भटकने की सद्भावनाएँ भरपूर है। यह पर्व उन चौराहों पर खड़ा होकर, पहरेदार की तरह, उन्हें भटकने से रोकता है। उनकी ऊंची उड़ती इच्छाओं और वृतियों पर अंकुश लगाता है। आज जहाँ नारी को केवल रूप-सौन्दर्य के आधार पर ही टोला जाता है और कुदृष्टि से ही देखा जाता है – वहां रक्षाबंधन का यह पर्व एक बुलंद और क्रांतिकारी सन्देश समाज को देता है। वह यह कि नारी केवल नवयौवना या युवती ही नहीं, कहीं न कहीं एक ‘बहन’ भी है। यदि यह पर्व अपनी वास्तविक गरिमा में प्रतिष्ठित हो जाए, तो समाज की बहुत सी भीषण समस्याओं का उन्मूलन सहज ही हो जाएगा।

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