टैक्स की चोरी अब संभव नहीं, जीएसटी को पैन नंबर से जोडेगी सरकार

पटना, बिहार/नगर संवाददाताः वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) शुरू करने के साथ ही सरकार सभी अप्रत्यक्ष करदाताओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कराधार प्रणालियों को भी आपस में जोडेगी। इसके लिए वह जीएसटी क्रमांक को आयकर विभाग द्वारा जारी स्थायी खाता संख्या (पैन) से जोडऩे की योजना बना रही है। इस योजना का मकसद कर से संबंधित कदाचार को रोकना है क्योंकि ऐसा होने के बाद आयकर भुगतान का मिलान जीएसटी भुगतान के साथ किया जा सकता है। उस सूरत में कर चोरी पर पूरी तरह लगाम लगाई जा सकती है। इसके साथ ही जीएसटी-पैन से जुड़ी प्रणाली का तालमेल भी आयकर के लिए पैन पर आधारित मौजूदा प्रणाली से पूरी तरह बैठ जाएगा। उसके बाद सूचना का आदान-प्रदान और करदाताओं का अनुपालन आसान हो जाएगा। कर की नई प्रणाली 1 जुलाई से प्रभावी होगी। पूरी व्यवस्था की जानकारी रखने वाले एक वरिष्ठ कर अधिकारी ने बताया कि पैन से जुड़ी प्रणाली प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों के बीच मिलान तो करेगी ही, दोनों प्रकार के करों को देखने वाले कर प्रशासनों के बीच भी तालमेल बिठा देगी। जीएसटी में सभी प्रकार के अप्रत्यक्ष कर समा जाएंगे। इनमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क तथा सेवा कर भी शामिल होंगे। केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड अप्रत्यक्ष करदाताओं को पहले ही अस्थायी पंजीकरण क्रमांक दे चुका है। पैन से जुड़े क्रमांक का फायदा समझाते हुए वरिष्ठ कर अधिकारी ने कहा कि पैन पूरे भारत में चलता है। देश भर में 24 करोड़ लोगों के पास पैन हैं, जबकि जीएसटी नेटवर्क के तहत अभी केवल 65.6 लाख लोगों ने ही पंजीकरण कराए हैं। राजस्व विभाग के पास पहले इस काम के लिए आधार का प्रयोग करने का प्रस्ताव आया था। लेकिन उसने इसे खारिज कर दिया क्योंकि आधार केवल नागरिकों को जारी किया जाएगा, जबकि पैन सभी कानूनी निकायों को जारी किया जाएगा। इनमें नागरिक, कंपनियां और साझेदारी वाली फर्म भी शामिल हैं। जीएसटी लागू होने से पहले सरकार ने कई प्रावधानों की अधिसूचना जारी की हैं। केंद्रीय जीएसटी, एकीकृत जीएसटी और राज्य जीएसटी जैसे प्रावधान और नियम अधिसूचित किए जा चुके हैं। इनमें कर के बिल, क्रेडिट और डेबिट नोट, खाते एवं रिकॉर्ड, रिटर्न तथा कर भुगतान, ऑडिट से जुड़े नियम शामिल हैं। लेकिन उद्योग को अब भी इस बारे में खटका है। अप्रत्यक्ष कर विभाग के पास जीएसटी से जुड़ी तमाम चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। उद्योग को फिक्र है कि जीएसटी सेवा प्रदाताओं की संख्या बहुत कम होने से दिक्कत होगी और कंपनियों के बीच संपर्क की विश्वसनीयता पर भी उसे संदेह है। बेहद छोटे खुदरा कारोबारियों को ऑनलाइन रिटर्न दाखिल करने में होने वाली दिक्कतें भी विभाग के सामने रखी जा रही हैं।

 

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