फसल की सही कीमत न मिलने से आत्‍महत्‍या को मजबूर होते हैं किसान

नई दिल्ली/नगर संवाददाताः भारत हर साल दो करोड़ पैंसठ लाख टन अनाज का उत्पादन करता है, फिर भी देश के बहुत से लोगों को भूखे पेट रहना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर किसानों को अपनी उपज का सही दाम भी नहीं मिल पा रहा है और कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। अपने उत्पादों की सही कीमत न मिलने पर किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं। किसान जब अपने उत्पादों को बाजार में बेचने जा रहा है तो उसे वाजिब कीमत नहीं मिल रही है, लेकिन इस कम कीमत का फायदा भी उपभोक्ता को नहीं मिल पा रहा है। अभी कुछ दिन पहले जब हम अपने गांव गए थे तो वहां पिताजी टमाटर एक रुपये प्रति किलो खरीद कर लाते थे। हमें तो यह बहुत आश्चर्यजनक लगा। क्योंकि बाजार में खासकर शहरी बाजार में टमाटर 30 से 40 रुपये प्रति किलो मिल रहा है और तो और यह टमाटर पिताजी सीधे किसी किसान से न लाकर सब्जी मंडी से लाते थे। आखिर जिस टमाटर की कीमत गांव की सब्जी मंडी में एक रुपये प्रति किलो है वही टमाटर शहर की सब्जी मंडी में आकर 30 से 40 रुपये प्रति किलो कैसे बिक रहा है। जो टमाटर एक रुपये प्रति किलो बिक रहा है उसके लिए किसानों को क्या मूल्य मिला होगा? सीधी सी बात है कि किसानों को अपने उपज का उचित मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में किसानों की हालत दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है और वह या तो आत्महत्या कर रहे हैं या फिर सड़कों पर आंदोलन के लिए उतर रहे हैं। अभी पिछले दिनों तमिलनाडु के किसानों ने लगभग 45 दिनों तक दिल्ली के जंतर मंतर पर अपने धरना प्रदर्शन से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। तमिलनाडु के किसानों ने आत्महत्या कर चुके अपने परिजनों की मुंड मालाएं हाथों में लेकर प्रधानमंत्री के आवास के पास प्रदर्शन किया। कभी महिलाओं की तरह साड़ियां पहनी तो कभी चूहों को अपने मुंह से पकड़ कर अपनी नाराजगी और गुस्सा दिखाया लेकिन केंद्र सरकार ने उनकी एक न सुनी। जबकि भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में किसानों को उपज लागत पर 50 फीसद मुनाफे का वादा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से प्रेरित था लेकिन केंद्र की सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि लागत पर 50 फीसद मुनाफा दिलाना संभव नहीं है। केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कह चुकी है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को फिलहाल लागू नहीं कराया जा सकता है। अलबत्ता केंद्र सरकार ने राज्यों से फसलों पर मिलने वाला बोनस भी बंद करा दिया है। लगातार दो साल सूखे की मार ङोलने के बाद किसानों को कुछ राहत की उम्मीद थी, पर उनकी उम्मीदों पर पर पानी फिर गया। भाजपा ने केंद्र की सत्ता में आने से पहले किसानों से वादा किया था कि सरकार बनने पर वह किसानों की आय दोगुना कर देगी लेकिन नरेंद्र मोदी के तीन साल के कार्यकाल में ऐसा नहीं हो सका। राज्य की सरकारों ने भी किसानों के कर्ज की समस्या को लेकर कोई राहतकारी कदम नहीं उठाया है। वहीं मध्य प्रदेश के किसान पिछले 1 जून से कृषि उत्पादों के उचित मूल्य, कर्ज माफी और अपनी आय को दोगुना करने की मांग के साथ सड़क पर बैठे थे। इसी दौरान मंदसौर में आंदोलन हिंसक हो गया और यहां हुई गोलीबारी में छह किसान मारे गए। आखिर क्यों सरकार इन किसानों के दर्द से अंजान रहना चाहती है जबकि किसान खुद अपनी हर व्यथा बताने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है। किसान चाहे खुद आत्महत्या करे या फिर पुलिस की गोली से मरे पर मरता तो किसान ही है न। अभी यह आंदोलन खत्म नहीं हुआ है, नासिक में किसान आंदोलन की कोर कमेटी बैठक हुई जिसमें तीन बड़े फैसले लिए गए हैं। इनमें 12 जून को सभी तहसील और जिलाधिकारी ऑफिस पर प्रदर्शन, 13 जून को रेल रोको आंदोलन और किसी मंत्री का कार्यक्रम नहीं होने देना का फैसला शामिल है। पूरे देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं और फिर किसानों का यह धरना प्रदर्शन जो पिछले करीब तीन महीने से चल रहा है उसके बावजूद सरकार उनके मुद्दों को लेकर सुस्ती दिखा रही थी तो दूसरी तरफ नीति आयोग जरूर किसानों की आय पर कर लगाने की सिफारिश कर रहा है। यह सब कुछ मोदी सरकार के दोहरे रवैये को ही उजागर करता है।

 

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