लड़कियां सोच-समझकर प्रशिक्षण संस्थान का चुनाव करें

बदलते परिवेश में कला के हर क्षेत्र की ओर लोगों का रुझाान बढ़ा है। शहर और कस्बों में प्रशिक्षण संस्थाओं का महत्व और उपयोगिता अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। इन प्रशिक्षण संस्थाओं के यकीकन चौंका देने वाले अत्यंन सुखद व सराहनीय परिणाम भी सामने आए हैं। प्रशिक्षण संस्थाओं में प्रशिक्षण ले कर साधारण प्रतिभाएं विशिष्टता हासिल करने में सफल हुई हैं।

इन प्रशिक्षण संस्थाओं के प्रति लड़कियां भी स्वाभाविक रूप से आकृष्ट हुई हैं क्योंकि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों के पास अधिक समय रहता हैं वे द्घर के कामकाज निपटा कर या तो बोर होती हैं या टी.वी. वगैरह देखकर समय का उपयोग करने के लिए वे प्रशिक्षण में प्रवेश ले कर कुछ करना चाहती है। उनका यह प्रस्ताव सराहनीय भी है।
लड़कियों की बढ़ती अभिरुची ने प्रशिक्षण संस्थाओं को एक नई धरा, दिशा एंव दशा प्रदान की है। प्रशिक्षण पाने वाली लड़कियों की संस्था बढ़ने से प्रशिक्षण संस्थाएं भी बढ़ी हैं और स्वरोजगार के असवर भी।
जहां कई प्रशिक्षण संस्थाएं प्रशिक्षण दे कर लड़कियों की प्रतिभाओं को उभर कर प्रतिष्ठित हो रही है, वहीं कई प्रशिक्षण संस्थाएं अपने दुष्चरित्र के कारण अन्य संस्थाओं की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचा रही है। इन संस्थाओं में प्रशिक्षण लेने आई लड़कियों का शैक्षणिक मार्गदर्शन के परिप्रेक्ष्य में दैहिक शोषण किया जाता है। स्कूली या महाविद्यालयीन स्तर की लड़कियां ही अधिकांशतः इस साजिश का शिकार होती है। कई प्रशिक्षण संस्थाएं लड़कियों के आपत्तिजनक फोटो खींच कर ब्लैकमेलिंग करने लग जाती है।
मंजू ने स्नातक करने के बाद अपनी पढ़ाई बंद कर दी। वह द्घर के कामकाज के बाद मिले समय को टी.वी. देखकर व्यतीत करती थी। वह चित्रकला में रुचि लेती थी। एक दिन पड़ोस की एक महिला ने उसे चित्र बनाते देखा तो उस महिला ने मंजू को सुझाव दिया कि मंजू, तुम चित्रकारी तो अच्छी करती हो किंतु तुम्हारे द्वारा बनाए चित्रों में कुछ कमियां रह जाती हैं।यदि तुम किसी संस्था में चित्रकारी का प्रशिक्षण ले लो तो अच्छी चित्रकार बन जाओंगी।
महिला बोली, हां, दशहरा मैदान के पास एक संस्था हैं वहां चित्रकला का प्रशिक्षण दिया जाता है। लड़कियां नहीं आई थी। कमरे में केवल मंजू और संस्था का संचालक दोनों बैठे थे।
संचालक ने मौका का फायदा उठाते हुए दरवाजा बंद कर दिया। दरवाजा बंद होने से मंजू को अपनी इज्जत खतरे में नजर आने लगी। संचालक उसकी ओर झपटा ओैर उसके कपड़े फाड़ने लगा। मंजू हिम्मत वाली लड़की थी। उसने हार नहीं मानी। उसने टेबल पर रखे पेपरवेट की मार संचालक सह नहीं सका। वह बेहोश होकर गिर गया।
मंजू अपने अस्त-व्यस्त कपड़ों को ठीक करते हुए दरवाजा खोल कर द्घर की तरफ भागी।
इस तरह के हादसे अक्सर देखने-सुनने को मिलते हैं। इसका कारण प्रशिक्षण संस्थाओं में प्रवेश लेने वाली लड़कियों की लापरवाही हैं लड़कियां जल्दबाजी में बिना सोचे-समझे प्रवेश ले लेती हैं जिसके कारण उनकी अस्मिता पर आंच आती हैं
अपना व्यक्त्वि और प्रतिभा निखारने के लिए लड़कियां प्रशिक्षण संस्थाअें का सहारा लेती हैं, यह तो ठीक है लेकिन वे बिना सोचे-समझे किसी भी प्रशिक्षण संस्था का चयन ने करें
प्रशिक्षण संस्था में प्रवेश लेने से ी पूर्ण संतुष्टि हो जाए कि प्रशिक्षण संस्था सही उद्देश्यों के लिए संचालित है, तभी उसमें प्रवेश लें अन्यथा प्रवेश लेने का विचार त्याग दें इस बारें में कुछ सुझाव दिये जा रहे हें:
पहले संस्था के विषय में जानकारी हासिल करें। जब बात की पूर्ण संतुष्टि हो जाए कि प्रशिक्षण संस्था सही उद्देश्यों के लिए संचालित है, तभी उसमें प्रवेश लें अन्यथा प्रवेश लेने का विचार त्याग दें इस बारें में कुछ सुझाव दिये जा रहे हें:
लड़कियां ऐसे प्रशिक्षण संस्थाओं में प्रवेश लेने की कोशिश करें जहां प्रशिक्षक कोई महिला हो।
प्रशिक्षण संस्था द्घर के पास में ही हो तो अच्छा रहेगा। द्घर से दूर, एकांत स्थान में स्थापित संस्थाओं में प्रवेश लेने से बचें। भीड़भाड़ वाले स्थान की संस्था में प्रवेश ले।
प्रशिक्षण संस्था के संचालक का दायित्व यदि किसी महिला के हाथ है तो भी तुरंत उस पर विश्वास न करें। अपनी सुरक्षा के लिए सचेत रहें।
यदि किसी छुट्टी के दिन संचालक का बुलावा आपके द्घर आए तो उसके पास न जाएं। यदि जाना जरूरी हो तो अकेली न जाएं। अपने साथ परिवार के किसी सदस्य या अपनी किसी सहेली को ले जाएं।
संचालक की ओर से मिले ऊल जुलूल प्रस्तावों जैसे फिल्म देखने या पिकनिक जाना आदि को तुरंत अस्वीकार कर दें।
किसी दिन ऐसी स्थिति भी आ है तो बेशक रूकें पर अन्य लड़कियों की अनुपस्थित के कारण यदि संचालकर केवल बातचीत या हंसी-मजाक कर समय व्यतीत करने लगे तो तत्काल द्घर वापस आ जाएं।
जाती है कि प्रशिक्षण लेने दो-तीन लड़कियां ही पहुंचती हैं, अन्य लड़किया अनुपस्थित रहती है। ऐसी परिस्थिति में यदि संचालक प्रशिक्षण देता है तो बेशक रूकें पर अन्य लड़कियों की अनुपस्थित के कारण यदि संचालकर केवल बातचीत या हंसी-मजाक कर समय व्यतीत करने लगे तो तत्काल द्घर वापस आ जाएं।
संचालक के द्घर में चाय-नाश्ता, भोजन बनाने या खाने-पीने को प्रस्ताव हो तो लड़कियां ऐसे प्रस्तावों से तौबा करें।
किसी भी प्रशिक्षण दौरान केवल अपने कार्य से मतलब रखें इधर-उधर की बातों में ध्यान न दें।
प्रशिक्षण संस्थाओं के प्ररिप्रेक्ष्य में लड़कियां की अस्मिता लूटे जाने जैसी दुखद व शर्मनाक घटनाअें से लड़कियां द्घबराएं नहीं ऐसी द्घटनाओं के बारे में सुनकर प्रशिक्षण लेने की अपनी इच्छा न त्यागें। लड़कियां सावधानी के साथ सोच-समझकर प्रशिक्षण संस्थाओं का चयन करें, साथ ही प्रशिक्षण काल के दौरान भी सचेत रहें ताकि किसी प्रकार की अप्रिय स्थिति बनने पर वे अपनी रक्षा स्वयं कर सकें।

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