एक पूर्ण सतगुरु ही दिव्य संस्कृति को पुनः स्थापित कर राष्ट्र का सृजन करते हैं – स्वामी आदित्यानंद जी

एक पूर्ण सतगुरु ही दिव्य संस्कृति को पुनः स्थापित कर राष्ट्र का सृजन करते हैं – स्वामी आदित्यानंद जी

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः भारतीय नव वर्ष 2074 के शुभ आरंभ हेतु दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिव्य धाम आश्रम में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। नव वर्ष 2074 के सुअवसर पर कार्यक्रम का आरंभ वेद मंत्रो के उच्चारण से किया गया। तत्पश्चात ईश्वर के श्री चरणों में पूजा अर्पित कर प्रार्थना अर्पित की गई कि नव वर्ष सभी के लिए मंगलमय और आध्यात्मिकता से परिपूर्ण हो। प्रेरणादायक सुमधुर भजनों का भी गायन किया गया। वर्ष की इस ऋतु में नव वर्ष का प्रारम्भ होना न सिर्फ हमारे मूल्यों और संस्कृति के अनुसार है बल्कि प्रकृति और समाज के अनुकूल भी है। कार्यक्रम में उपस्थित भक्तजनों को नव वर्ष की बधाई देते हुए संस्थान के प्रवक्ता सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्यस्वामी आदित्या नंद जी ने भारतीय नव वर्ष दृ विक्रम संवत 2074को मनाने और इसकी महत्वता के प्रति जागरूक करवाया। स्वामी जी ने प्रवचनों में बताया कि जब-जब भी युग पुरुष इस धरा पर अवतरित होते हैं तो जगत में उजियारा, नवचेतना और नवसृजन का संचार करते हैं। विश्वधरा के आंचल पर एक अजब करिश्मा कर प्रत्येक हृदय को एक सूत्र में पिरोते हैं, क्योंकि यह मातृ भूमि ऋषियों, संतों महापुरुषों की भूमि है। अज्ञानता के अंधकार में डूबे इस समाज को ज्ञान के दीपक से आलोकित कर वक्त की सोई हुई रूहों को जगाने के लिए समय समय पर संतमहापुरूष इस धरा पर अवतरित होते हैं। परमात्मा सम्पूर्ण समाज कल्याण हेतु एक महान तत्वदृदृष्टिसतगुरु के रूप में आकर समाज को सत्य का बोध कराते है।

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पूर्ण गुरु ही दिव्य संस्कृति के पोषण, राष्ट्र के सृजन और अध्यात्म की प्रचंड क्रांति हुआ करते है जो घनघोर आंधियों के विरुद्ध एक ऐसी शमा जला कर बिखरी हुई भावनाओं को समेटकर प्रत्येक हृदय को उस ईश्वर में एक कर दिया करते है, ऊँच नीच का भेद मिटाकर समाज की सूरत बदल रूढ़िवादिता की जंजीरों को तोड़कर जागृति का आगाज कराते है तथा मानव के भीतर आध्यात्मिक क्रांति का सूर्य उदयकर जीव को सत्य के पथ से जोड़ अमावस की काली रातों में नया सवेरा भरते है। अपने प्रवचनों में स्वामी जी ने बताया कि महापुरुष मानव में ऊँच नीच की भावना तथा ईश्वर भक्ति के नाम पर किए जाने वाले विवाद को सारहीन और निरर्थक बताते हुए सबको परस्पर मिल जुलकर प्रेम पूर्वक रहने का उपदेश देते है। ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित भावना और सद्व्यवहार का पालन करना अति आवश्यक है। अभिमान त्यागकर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। साध्वी श्यामा भारती जी ने कहा कि आज भी मानव को एक ऐसे ही ब्रह्मनिष्ठ गुरु की आवश्यकता है क्योंकि आज का मानव भी अपराध जगत का नायक बन चुका है, रक्षक भक्षक बन चुका है।अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रता पूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है। साध्वी जी ने कहा कि आज मानव में दानव जाग उठा है, रिश्तों की पवित्रता मिट्टी में मिल रही है इसलिए आज जरूरत एक ऐसे पूर्ण सतगुरु की जिसके द्वारा मानव ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर ईश्वर का साक्षात्कार कर अपने अंर्तजगत की दुनिया को बदल सकता है। संस्थान के प्रवक्ताओं ने इतिहास से भक्तों के जीवन की प्रेरणाओं को श्रद्धालुओं के समक्ष रखा तथा सभी को भक्ति के दिव्य मार्ग पर उत्साह पूर्वक और दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। दिव्य प्रवचनों को श्रवण कर सभी ने भक्ति मार्ग पर अग्रसर होने और ब्रह्मज्ञान के दिव्य सन्देश को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प भी लिया। “सभी का जीवन सुखद, स्वस्थ और आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध हो” की दिव्य प्रार्थना के साथ कार्यक्रम का संपन्न किया गया।

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