भारतीय नववर्ष पर, जन जन में अध्यात्म का संचार हो

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः क्या आप जानते हैं? विक्रम सवंत् 2074 की चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को याने 28 मार्च को हमारे भारतवर्ष के नववर्ष का आरंभ हैं? यह तिथि एक प्रकार से हमारी भव्य संस्कृति व सभ्यता का स्वर्ण दिवस हैं! भारतीय गरिमा में निहित अध्यात्म व विज्ञान से परिचित होने और गर्व करने का अवसर हैं! धरती के जिस टुकड़े पर हमारा जन्म हुआ, हमारा पालन पोषण हुआ, जहां हम रहते हैं, जिससे हम जुड़े हुए हैं-यदि उसकी महानतम संस्कृति से हम अनभिज्ञ रहे तो हमारी स्थिति भी उस भिखारी के समान होगी जो सारी जिंदगी भीख ही मांगता रहा पर उसकी मृत्यु के उपरांत, जिस जगह पर वह भीख मांगता था, जब उसे खोदा गया, तो वहां नीचे से अशर्फियों से भरा हुआ कलश निकला। उस भिखारी को धन का ज्ञान ना होने के कारण अपना सारा जीवन कष्ट में बिताना पड़ा। यही स्थिति हमारी भी हैं। हम अपने राष्ट्र भारत के गर्भ में छिपे अध्यात्म विज्ञान, संस्कृति व मूल्यों के रत्नों से परिचित नहीं और पाश्चात्य देशों का अनुकरण कर रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं दृ विक्रमी सवंत् पर आधारित भारतीय नववर्ष को भूलकर 1 जनवरी को नववर्ष का उत्सव मनाना। भारतीय कैलेंडर के अनुसार जिस दिन सृष्टि का आरम्भ हुआ, उसे ही नववर्ष के प्रथम दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। इसका अनुसरण करते हुए दृ महाराजा विक्रमादित्य ने 2069 वर्ष पूर्व एक कैलेंडर की शुरुआत की, ताकि हम अपनी भारतीय तिथियों, महीनों व वर्षो से परिचित रहे। इस विक्रमी सवंत् के हिसाब से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारतीय नववर्ष का पहला दिवस स्वीकार किया गया। वहीँ दूसरी ओर, ग्रेगोरियन कैलेंडर, जिसे हम पाश्चात्य अंधानुकरण के कारण मानने लगे हैं, उसका निर्माण केवल कुछ अंदाजो व अनुमानों के आधार पर हुआ। ईसा मसीह के जाने के कई वर्षो बाद इस कैलेंडर का निर्माण किया गया। उस समय यही अंदाजा लगाया गया कि ईसा मसीह का जन्म जब हुआ था, तब सर्दियाँ अपने चरम पर थी। इसलिए सर्दी के उन्ही दिनों को नववर्ष के रूप में स्वीकार किया गया, जिसे हम 1 जनवरी कहते हैं! यह ठीक वैसे ही हैं, जैसे पुराने समय में किसी के जन्म के बारे में पूछने पर कहा जाता था कि इसका जन्म तब हुआ था जब कुछ-कुछ ऐसी ऋतु थी, तेज हवाएँ चल रही थी, बड़ी बारिश भी हो रही थी अर्थात तिथि याद नहीं बस अनुमान हैं। यही इस कैलेंडर के साथ भी रहा। अनुमानों के आधार पर इस कैलेंडर में समय के साथ-साथ कई फेरबदल भी किए गए। इस ग्रेगोरियन कैलेंडर में, जिसमें अब जनवरी से दिसंबर तक बारह महीने हैं, पहले उसमें मात्र 10 महीने ही थे। जुलाई व अगस्त का महीना इसमें बाद में जोड़ा गया। 10 महीने के कैलेंडर में लगभग 300 दिन थे। अब समस्या यह आई की सारी ऋतुएँ तो करीबन 365 दिनों में पूरी होती थी, पर कैलेंडर में 300 दिन होने के कारण यदि जनवरी में कड़ाके की ठंड पड़ रही हैं तो अगली बार जनवरी में मौसम कुछ और होता, उसके बाद कुछ और होता। यह देखकर अनुमान से 30 दिन और जोड़ दिए गए। इस प्रकार ‘जुलाई’ का महीना अस्तित्व में आया, जो श्रद्धांजलि थी ‘जूलियस सीजर’ को। इस प्रयास के बाद भी सही तिथि पर सही ऋतुएँ नहीं आ रही थी। तब उन्होंने 30 दिन और जोड़ दिए और उस महीने को ‘संत अगस्टाइन’ को समर्पित करते हुए अगस्त नाम दिया। इस प्रकार 10 महीने से यह 12 महीने का कैलेंडर बना। हो सकता हैं, आपको यह एक मनगढ़ंत कहानी लगे, परन्तु यह तथ्य एकदम सत्य हैं और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी हमारे पास हैं! देखिए, इस कैलेंडर के अनुसार अंत के चार महीने क्या हैं? September, October, November, December…September के पहले चार अक्षर क्या हैं? Sept अर्थात सप्त, सातवांमहीना! October अर्थात Oct – आठवां महीना! November याने नवम् – नौवां महीना!  December अर्थात Deca- दसवांमहीना! आपने वैज्ञानिक भाषा में पढ़ा होगा-पेन्टा, हैक्सा… डैका! इससे साबित होता है की यह कैलेंडर पहले सिर्फ 10 महीने का ही था! एक और तथ्य आपके समक्ष रखते हैं, दिसम्बर में आने वाले पर्व क्रिसमस को X-mas भी कहा जाता हैं! रोमन भाषा में दस का संकेत X हैं। हम देखें, दसवीं कक्षा को हम कैसे लिखते हैं- Xth! सो X क्या हुआ-10 और mas अर्थात मास – महीना! इसलिए X – mas मतलब दसवां महीना! पर वही बाद में जुलाई और अगस्त माह डालने पर 12वां महीना हो गया। मतलब यह की इस ग्रेगोरियन कैलेंडर का निर्माण जोड़ तोड़ के आधार पर ही साकार हुआ! तो आइए, हम अपनी भारीतय संस्कृति व सभ्यता की वैज्ञानिकता व शिवमय महिमा को समझते हुए उनसे भी जुड़ें। अपने विक्रमी संवत के अनुसार नववर्ष मनाएँ, जिसका आधार कल्पनाएँ या अनुमान नहीं, अपितु अध्यातम और विज्ञान हैं। गर्व से स्वीकार करें, अपनी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को, जिसके पीछे हमारे महान ऋषियों का प्रकाश हैं।

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