प्रभु भक्ति, प्रेम, त्याग, तपस्या का जल बरसाने आया होली का त्यौहार

प्रभु भक्ति, प्रेम, त्याग, तपस्या का जल बरसाने आया होली का त्यौहार

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः होली ऐसी होती है, जहाँ दिव्य प्रेम की खुशबू है। जहाँ ईश्वर से अंतरंग संबंध है। जहाँ अन्धविश्वास नहीं बल्कि अनंत विश्वास है। फिर ऐसे अनोखे खेलने के अंदाश पर कोई कैसे बुरा मान सकता है?
बुरा मानें या न माने? अरे होली है!
होली के दिन अगर कोई ऊपर रंग डाले, तो क्या बुरा मानने वाली बात है? बिल्कुल नहीं। अगर कोई पिचकारी से रंगों की बौछार करे, तो क्या बुरा मानने वाली बात है? बिल्कुल नहीं। अगर कोई खुशी में झूमे-नाचे, तो क्या बुरा मानने वाली बात है? बिल्कुल भी नहीं। तभी तो जब गुब्बारा पड़ता है, कपड़े भीगते हैं, अलग-अलग रंगों और डिजाइनों में चेहरे चमकते हैं- तो भी सब यही कहते हैं-‘भई बुरा न मानो, होली है!’
लेकिन यदि रंग की जगह लोग एसिड फेंकने लग जाएँ….खुशी में झूमने की जगह नशे में होशो-हवास खोकर अश्लील और भद्दे काम करने लग जाएँ…. पर्व से जुड़ी प्रेरणाएँ संजोने की बजाए, हम अन्धविश्वास और रूढ़िवादिता में फँस जाएँ- तब? तब फिर इस पर्व में भीगने की जगह पर्व से भागना ही बेहतर है। प्रस्तुत है इस पर्व की कुछ बिगड़ी हुई झलकियाँ, जिनके चलते यही कहना सही है-‘बुरा कैसे न मानें? अरे, यह कैसी होली है!’
रंग हुए बदरंग
अपने निजी स्वार्थ के लिए आज हमने त्यौहारों के मूल रूप को ही बर्बाद कर दिया है। हमने मिलावट की सारी हदें पार कर दी हैं। होली के रंगों में अक्सर क्रामियम, सीसा जैसे जहरीले तत्त्व, रसायन इत्यादि पाए गए हैं। इन मिलावटी रंगों से एलर्जी, अन्य बीमारियाँ, यहां तक कि कैंसर होने का खतरा भी होता है। अफसोस! जहाँ रंगों से जिन्दगी खूबसूरत होनी चाहिए थी, वहाँ आज ये जानलेवा बन गए हैं। निम्न खबरें एवं सुर्खियां इस तथ्य को बखूबी दर्शाती हैं-
6 मार्च, 2015ः होली खेलने निकली नवविवाहिता के चेहरे पर एसिड फेंक दिया गया। रंग की जगह एसिड फेंकने का कारण क्या था, जानते हैं? आपसी रंजिश! कहाँ तो एक समय था, जब होली के रंगों से सारे बैर-द्वेष-झगड़े भुला दिए जाते थे, प्रेम-सौहार्द और भाईचारे की खुशबू बिखरी जाती थी और कहाँ आज रंगों की आड़ में दुश्मनी निकाली जाती है। 8 मार्च, 2012ः मुम्बई में रंग-विषाक्त रंगों के शिकार बन गए। इनमें ज्यादातर 9-10 साल के बच्चे थे, जिन्हें होली खेलते-खेलते शरीर में एलर्जी हो गई। थोड़ी देर में सभी बच्चे बेहोश हो गए। उन्हें तुरन्त अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ एक मासूम ने दम तोड़ दिया। 27 मार्च, 2013ः रसायन-युक्त रंगों के फेंकने से दरवाजों के पास खड़े 6 लोग चलती ट्रेन से गिर पड़े। रात के 8 बजे, दादर-ठाणे जाने वाली लोकल ट्रेन में कुछ शरारती तत्त्वों ने दरवाजें पर खड़े यात्रियों पर रंग डाला। लेकिन वह रंग न होकर, एक रासायनिक पाउडर था, जिसके आँखों में जाते ही, लोगों की आँखें बुरी तरह जलने लगीं। इस बेचैनी के कारण उनकी पकड़ ढीली पड़ गई और 6 लोग चलती ट्रेन से गिर गए। एक 28 वर्षीय युवक अपनी जान गंवा बैठा। न केवल होली के रंग स्वार्थ, द्वेष, लोभ आदि विकारों के कारण घातक हुए हैं, बल्कि अंधविश्वास और रूढ़िवादी परम्पराओं ने भी इस पर्व में दुर्गंध घोल दी है। रूढ़िवादी परम्पराएँ- कैसी विडम्बना है-कहाँ तो हमें इतिहास के दृष्टांतों के पीछे मर्म को समझना था और कहाँ हमने इनके अर्थ का अनर्थ कर डाला। सबसे पहले तो, प्रहलाद ने स्वयं जानबूझकर अग्नि में प्रवेश नहीं किया था- यह जाँचने या परखने के लिए कि क्या भगवान उसे बचा सकते हैं। बल्कि उसे षड्यंत्र के तहत उस धधकती ज्वाला में बिठाया गया था। ऐसे में, प्रहलाद का दृढ़ विश्वास व सच्ची भक्ति उसके सुरक्षा कवच बने। हमारी तो प्रहलाद जैसी भक्ति भी नहीं है, फिर भी हम भगवान की शक्ति को परखने चल पड़ते हैं। पर्व तो आनंद और उल्लास के लिए मनाए जाते हैं, न कि खतरनाक करतब करके किसी अनहोनी या दुर्घटना को जन्म देने के लिए। जहाँ होली का चेहरा समय के साथ और ज्यादा खराब तथा भयावह होता जा रहा है, वहाँ अभी भी कुछ क्षेत्र, कुछ प्रांत और कुछ प्रथाएँ ऐसी हैं, जो इसे खूबसूरत बनाए रखने में प्रयासरत हैं। आइए, अब उनकी बात करते हैं ताकि उनसे प्रेरणा ले सकें। उत्तर प्रदेश, बंगाल इत्यादि में कुछ जगहों पर आज भी ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं, जहाँ होली को रंग-बिरंगे फूलों से और टेसू के फूलों से बने शुद्ध रंगों से खेला जाता है। इससे न तो लोगों को किसी प्रकार से हानि पहुँचती है, न ही प्रकृति को। इसी तरह दक्षिण भारत के कुदुम्बी तथा कोन्कन समुदाओं में होली हल्दी के पानी से खेली जाती है। इसलिए वहाँ होली का त्योहार ‘मंजल कुली’ नाम से मनाया जाता है, जिसका मतलब होता है- हल्दी-स्नान! केरल के लोक-गीतों के संग इस पर्व में सभी लोग शामिल होते हैं। अतः इस प्रकार हल्दी के औषधीय गुणों से खुद को तथा वातावरण को लाभ देते हैं। निःसंदेह, ऐसे उदाहरण सराहनीय है तथा अनुकरणीय भी। ऐसी प्रेरणाओं को अपनाकर हम इस रंगों के पर्व को फिर से सुंदर बना सकते हैं। परन्तु होली की वास्तविक खूबसूरती सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। मूल रूप से यह पर्व दिव्यता एवं शुद्धता से परिपूर्ण है। इतिहास के पन्नों से हमें ऐसे अनेक दृष्टांत मिलते हैं, जो इस त्यौहार की पावनता, अलौकिकता एवं आनंद की गहराई को दर्शाते हैं। आइए, ऐसी कुछेक दिव्य प्रेरणाओं से हम भी लाभांवित होते हैं। कान्हा की अपने सखाओं के संग होली- ब्रज की भूमि ने बहुत से ऐसे पलों का साक्षात्कार किया है, जिसमें होली का शुद्ध दृ विशुद्ध एवं दिव्य रूप उजागर हुआ है। एक बार होली पर सारे गोप-ग्वाले इकट्ठे हुए और नंदभवन की ओर दौड़ पड़े। उसमें मस्ती थी, खुशी थी, साथ ही अपने कान्हा के संग रंग में रंग जाने की चाह थी। पर इधर कान्हा ने जैसे ही उन सबकी आवाज सुनी, तो फटाफट घर के अंदर दौड़ गए। माँ यशोदा के आँचल में छिप कर बोले-‘मैया, मुझे छिपा लो… वे सब मिलकर मुझ अकेले पर बहुत सारा रंग डाल देंगे… मुझे डर लग रहा है…. तुम उन सबसे जाकर कह दो न कि कान्हा घर पर नहीं है…।’ माँ यशोदा ने जब बाहर जाकर यह बात बोली, तब सारे ग्वाल-बाल एक साथ बोल पड़े-‘नहीं, वह अंदर ही है… हमें सब पता है….।’ इतने में मधुमंगल बोला-‘मैया, अगर तुम हमें भीतर जाकर देखने दोगी, तब ही हम मानेंगे।’ मैया की उनकी हठ के आगे कहाँ चलने वाली थी! सो, माँ यशोदा ने सिर्फ मधुमंगल को भीतर जाने की अनुमति दे दी। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मधुमंगल ने आखिर कान्हा को ढूँढ़ ही निकाला और थोड़ा सा बिगड़ते हुए बोला-‘अपने सखाओं से झूठ बोलता है तू, कान्हा? देख ले, यह अच्छी बात नहीं है। मैं अभी सबको जाकर बताता हूँ…।’ कान्हा को मालूम था कि मधुमंगल को लड्डू बहुत पसंद हैं। उसने कहा-‘देख मधुमंगल, मुझे डर लग रहा है। अगर तू जाकर उनसे कह देगा कि मैं नहीं हूँ, तो मैं तुझे बहुत सारे लड्डू दूँगा….।’ बस, अब क्या था…. गोल-गोल लड्डुओं की चाह में मधुमंगल फिसल गया। पर कान्हा की चतुराई को भी जानता था। इसलिए बोला-‘पहले लड्डू दे….।’ कान्हा ने अच्छे सखा की भाँति अपना वादा पूरा किया। लड्डू की एक भरी हुई थाली मधुमंगल के हाथ में थमा दी। मधुमंगल की खुशी सातवें आसमान को छू रही थी। इसी खुशी में झूमता हुआ वह बाहर आया, जहाँ सारे उसकी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही सबने पूछा-‘कान्हा मिला?’ तो मालूम है, मधुमंगल क्या बोला-‘हाँ, हाँ… वह भीतर ही है। उसने मुझे कहा कि जाकर बाहर कह दे कि मैं नहीं हूँ….।’ ओह! इसके ऐसा कहते ही फिर क्या हुआ होगा! इस बात का अंदाजा शायद आप लगा चुके होंगे। कान्हा और सारे ग्वाल-बालों ने एकसाथ खूब मस्ती की। प्रेम से एक-दूसरे पर रंग उड़ाया। नाचे-झूमे और फिर अपने-अपने घर चले गए। देखा आपने-इस दृश्य में मजाक था, मस्ती थी, नटखटपन भी था….। लेकिन मार-पीट नहीं थी, रंग, ग्रीस, पैट्रोल जैसे अवांछनीय पदार्थ नहीं थे। इसके लिए फिर सचमुच यह कहा जा सकता है-बुरा न मानो, होली है। साईं बाबा की अपने भक्तों के संग होली- सन् 1917 में, होली के दिन… हेमदपंत ने सबको भोजन पर आमंत्रित किया हुआ था। पिछली रात को बाबा ने भी उसके स्वप्न में आकर दर्शन दिए थे और उसकी चाहत को पूरा करते हुए कहा था- ‘मैं भी कल तेरे घर भोजन करने आऊँगा….।’ हेमदपंत ने अपनी पत्नी को स्वप्न के बारे में बताते हुए कहा- ‘तुम आने वाले मेहमानों से एक थाली ज्यादा बनाना…. आज बाबा हमारे घर भोजन करने आएँगे।’ सब लोग यथा समय पहुँच गए। हेमदपंत बार-बार दरवाजे की तरफ देखता, कभी हल्की सी भी आहट सुनने पर दरवाजे की दिशा में दौड़ पड़ता। भोजन परोसने का समय आ गया, पर बाबा नहीं आए। हेमदपंत मन ही मन अपने साईं से प्रार्थना कर रहा था… सबकी थालियाँ लग गई थीं… पर बाबा का आसन अभी भी खाली था। मायूसी हेमदपंत को पकड़ने ही वाली थी कि अचानक…. दरवाजे पर दस्तक हुई। वहाँ दो लोग खड़े थे। उन्होंने हेमदपंत को अखबार में बंध कुछ पकड़ाया और ध्न्यवाद कहकर चले गए। जब उसे खोला, तब उसमें से क्या निकला? साईं की तस्वीर! हेमदपंत की आँखें छलक आईं। उसने बाबा के आसन पर वह स्वरूप सजाया, स्वरूप के सामने थाल रखकर भोग लगाया और खुशी से सबको भोजन कराया। इधर शिरडी में उसी समय जब जामा ने बाबा से भोजन करने के लिए कहा, तो साईं बोले-‘जामा, आज तो हेमदपंत ने बहुत सारा भोजन खिला दिया।’ देखा आपने-पहले तो होली मनाने का एक अनूठा ढंग, जिसमें सौम्यता भी है और सात्विकता भी! फिर अपने ईश्वर के आने की चाह है, इंतजार है। हृदय से निकलने वाली सच्ची पुकार है। जब भावनाओं में ऐसी सुन्दरता और शुद्धता हो, तब फिर कोई कैसे बुरा मान सकता है? तो आएँ, इस पर्व की बिगड़ी हुई सूरत को फिर से खूबसूरत बनाएँ। अमीर खुसरो, बुल्लेशाह, हेमदपंत, हरिदास आदि की तरह अपने मन को ईश्वरीय रंग में रंग कर। फिर भीतर और बाहर-दोनों और शुद्धता और पावनता के रंग ही बरसेंगे… न कोई बुरा मानेगा… न कोई बुरा करेगा… और इस पर्व के आने पर सब खुशी से एक स्वर में कह उठेंगे… होली हैं!

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