भारत के गांवों का जीवन

मदुरई, तमिलनाडु/मांगीलाल अंजणाः भारत वर्ष प्रधानतः गांवों का देश है। यहाँ की दो-तिहाई से अधिक जनसँख्या गांवों में रहती है। इसका एक मुख्य कारण यह है कि उनका मुख्य निर्भरता वाला व्यवसाय खेती है, और इस पर वो निर्भर है। भारत में लगभग छह लाख गांव है। जहां देश की दो तिहाई जनसंख्या निवास करती हो उस जगह का विकाश नहीं हो तो देश के विकाश की कल्पना तक करना एक विचार मात्र होगा इसलिए गांवों के विकास के बिना देश का विकास नहीं किया जा सकता है, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता क्योकि गांव भारत का आइना है। यहाँ भारत की वास्तविक छवि उभरती हे ! में तो यही कहूँगा की गांव ही भारत है। यहाँ के गांव ही ये देश है। लेकिन कहने के लिए बहुत कुछ पर हकीकत में कुछ थोड़ा सा काम अभी बाकी है। गांवों की जनता अभी भी झोपड़ी में निवास करती है घास फुस की बनी वो छप्पर, कीचड़ मिटटी के बने वो कच्चे आँगन, अब भी वो कच्ची टूटी हुई सड़के जो हमें गांवों का रास्ता दिखाती है। हरियाली से घिरे वो गांव, सब्जी, फलों एवं पेड़ पौधो की छटाएं अपनी हरियाली के नखरे बिखेरती और अपनी खुशबु से आने जाने वालो को सराबोर करती वो रौनक, और इन छायादार पेड़ो की रौनक के बीच इनके निचे बैठकर गांवों के लोगो की वो जुगल बंदी वो विश्राम वो प्यार वो चौपाल वो हुका परस्ती और अपने सुख दुःख की वार्तालाप , बस ये सब और कही नहीं बल्कि भारत के गांवों में आज भी मौजूद है। गांव के बाहर का वो कुआ जहाँ गांव की सारी पनहारिया अपना घड़ा कमर में पकड़ के एक साथ बाते करती हुई पानी भरने जाती है प्रात काल और साँझ की बेला की वो रौनक केवल गांव के कुओ पर ही पाई जा सकती है और कही नहीं। भारत की संस्कृति की शान घूँघट निकाले वो पनहारिया तीन तीन मटके अपने हाथो में पकडे, अपने ही अंदाज में अपने समूहों में बाते करती और साथ ही साथ उनकी पायलों की वो झंकार उस जगह का माहोल ही अलग बना देती है। यहाँ के गांवों का ये माहौल और कही नहीं पाया जा सकता। ताजी प्रदुषण रहित हवा का आनंद, खुले मैदान, हरे भरे खेत, भरे पुरे खलिहान यहाँ का रमणीय दृश्य प्रस्तुत करते है। यहाँ का सात्विक एवं पोस्टिक भोजन उम्र दराज लोगो की सेहत तक का परिचय करवाता है। गांवों का विद्यालय जिसमे कमरो का अभाव और साथ ही साथ अध्यापको का भी अभाव होता है, और गांवों के नीचे पेड़ की छाया में कट्टे, बोरी बिछा कर बैठने की प्रथा का आनंद डेल्ही पब्लिक स्कूल में भी नहीं मिल सकता। बेशक शाम तक कपडे गंदे हो जाते है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय एवं प्रकृति की गोद में निवास करते गावो के लोग अपने जीवन का एक अलग ही आनंद लेते है। किसानो को सुबह और शाम अपने पशुओ को खेतो में चराने ले जाते और ले आते पशुओ के गले में बंधी उस घंटी की मधुर आवाज एक संगीतमय शाम का अहसास करवाती है। इन सब अद्भुत आकर्षण दृश्यों का अनुभव सिर्फ और सिर्फ भारत के गावो में ही लिया जा सकता है और कही नहि है। यह एक सास्वत सत्य है कि हर एक बुरा पहलु एक अच्छाइ लिए होता है तो अच्छा पहलु कोई कमजोरी भी लिये होता है। हर अँधेरे के पीछे एक उजाले की किरण होती है तो उस उजाले के पीछे एक अँधेरे की घनी छाव भी जरूर नजर आती है। गांवों की इन सब बातो के बावजूद कुछ सुने अनसुने ऐसे भी पहलु है की यदि यही देश की आत्मा है यही देश की शान है यही देश का मान है तो फिर यहाँ इन कई सारी समस्याओं का बोलबाला क्यों? पुलिस स्टेशन का अभाव, पोस्ट ऑफिस का अभाव ,स्वस्थ्य सेवाओ का अभाव काफी सारी असुविधाये जो हमें एक कठिन जीवन का अहसास जरूर कराती है। साथ ही साथ अशिक्षा के कारण लोगो के उस एक डर के कारण कुछ असामाजिक तत्वों का खुले आम घूमना  कई सारी अच्छाइयों के साथ साथ कई सारी समस्याएं भी हर जगह रहती है। जो हर सिक्के का एक पहलु होता है। इस बात से गाव भी अछूते नहीं रह सकते है।  भारत का इतिहास भी एक गौरवशाली और काफी गहन है। कई पड़ावों वाला इतिहास हम कह सकते है। एक लम्बे अरसे तक अंग्रेजी हुकूमतों के साथ साथ कई और हुकूमतों ने भी इस देश पर शासन किया है।  इस काल में उन्होंने जैसे चाहा वैसे किया।  वो उनका समय था  होना लाजमी था।  स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के गांवों ने बहुत हद तक उन्नति की है। यह स्थिति अंग्रेजो के जाने के बाद के समय के गावो को आज के गावो से तुलना करके देखा जा सकता है। स्वतंत्र भारत की सरकार ने गावो की उन्नति के लिए काफी प्रयत्न किये। लेकिन फिर भी आज से कुछ समय पहले तक की स्थिति को देखा जाये तो कई सारी समस्याएं सर उठाये खड़ी थी अपना एक पूर्ण दबदबा बनाये खड़ी थी। उनका कारण उसी सिक्के का दुसरा ही पहलु था ना की दूसरे सिक्के का कोई पहलु। अंग्रेजी हुकूमत के जाने के बाद स्वाधीन भारत ने अपने सिरे से देश का विकास शुरू किया और खेती के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। 1952 में जब पहली पंचवर्षीय योजना का आरम्भ हुआ तो उसमें खेती के विकास पर सबसे अधिक ध्यान दिया गया। खेती के विकास के साथ-साथ ग्राम-विकास कि गति भी बढ़ी। आज भारत के अधिकाँश गांवों में पक्के मकान पाये जाते हैं। लगभग सभी किसानों के पास अपने हल और बैल हैं। बहुतों के पास ट्रेक्टर आदि भी पाये जाते हैं।कुछ किसानो ने अपनी व्यवसाय से बढ़ती आय के कारन थोड़ा और आगे बढ़कर कुछ नए खेती के उपकरणों का उपयोग भी सुरु किया हे जिससे किसानों कि आय भी बढ़ी है। पहले की तुलना में आज के भारत के गावो में ग्राम-सुधार की दृष्टि से शिक्षा पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है। आज अधिकाँश गांवों में प्राथमिक पाठशालाएँ हैं। जहाँ नहीं हैं, वहाँ भी पाठशाला खोलने के प्रयत्न चल रहे हैं। काफी सारी सरकारी योजनाओ के बावजूद भी किसान की स्तिथि में ज्यादा सुधार नहीं आया हे ,, हां ये जरूर हे की सरकार की कुछ योजनाये काफी हद तक अच्छा कुछ करने में सफल हुई हे ! लेकिन किसानों की दयनीय स्थिति का एक प्रमुख कारण ऋण है। जैसा मेने पहले उजागर किया की किसानो की स्तिथि को दयनीय बनाने में अपने ही लोगो की अपने ही सिक्के के एक पहलु की ही भूमिका हे वो हे सेठ-साहूकार जो थोडा सा क़र्ज़ किसान को देकर उसे अपनी फसल बहुत कम दाम में बेचने को मजबूर कर देते हैं। हां सरकार ने इस तरफ अपना ध्यान आकर्षिक करके अपना काम सुरु किया हे जो काफी सफल भी हो रहा हे इसलिए गांवों में बैंक खोले जा रहे हैं जो मामूली ब्याज पर किसानों को ऋण देते हैं। और भी इससे थोड़ा सा आगे बढ़कर सरकार ने किसानो को और गावो को आधुनिकता से जोड़कर कई नई योजनाओ की सुरुआत भी की हे जो एक हद तक सार्थक हो रही हे ,, पर पूर्ण रूप से नहीं ! जिसमे की ग्रामीण व्यक्तियों को विभिन्न व्यवसायों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। हथकरघा और हस्त-शिल्प की ओर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विचार यह है कि छोटे उद्योगों व कुटीर उद्योगों की स्थापना से किसानों को लाभ हो। पहले गांवों में यातायात के साधन बहुत कम थे। गांव से पक्की सड़क 15-20 किलोमीटर दूर तक हुआ करती थी। कहीं-कहीं रेल पकड़ने के लिए ग्रामीणों को 50-60 किलोमीटर तक पैदल जाना पड़ता था। अब धीरे-धीरे यातायात के साधनो का विकास किया जा रहा है। फिर भी ग्राम-सुधार की दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अभी भी अधिकाँश किसान निरक्षर हैं। गांवों में उद्योग धंधों का विकास अधिक नहीं हो सका है। ग्राम-पंचायतों और न्याय-पंचायतों को धीरे-धीरे अधिक अधिकार प्रदान किये जा रहे हैं। इसलिए यह सोंचना भूल होगी कि जो कुछ किया जा चुका है, वह बहुत है। वास्तव में इस दिशा में जितना कुछ किया जाये, कम है। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि गांवों के विकास पर ही देश का विकास निर्भर है। यहाँ तक कि बड़े उद्योगों का माल भी तभी बिकेगा जब किसान के पास पैसा होगा। थोड़ी सी सफाई या कुछ सुविधाएँ प्रदान कर देने मात्र से गांवों का उद्धार नहीं हो सकेगा। गांवों की समस्याओं पर पूरा-पूरा ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। मै तहे दिल से अपना आभार प्रकट करता हु मेरे अजीज मित्र और पत्रकार श्री मांगीलाल चौधरी का की उनके के इस नेक कार्य एवं आग्रह पर मुझे ये लेख लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। क्यूकि सरकार बहुत सी योजनाये और कई सारी नीतिया पास करती है पर भारत के उस अंतिम छोर तक वो नहीं पहुंच पति क्योकि शिक्षा की कमी के कारण ,,इसलिए इस तरह के साप्ताहिक पत्र पत्रिकाएं गावो तक पहुचे और ऐसी पहल इस दिशा में भी एक अहम् और मिल का पथ्थर साबित हो सकती है। गावो के किसान भाइयो को , उम्र दराज माता पिताओ को ,, और अशिक्षित माता बहनो को अपने अभिकरो का और अपने लिए निकाली गई सरकारी योजनाओ का पता चलेगा और वो इसका फायदा उठा पाएंगे ! अंतत में इतना ही कह पाउँगा की आज तक भारत के गावो का जो विकाश हुआ है वो केवल ऊट के मुह में जीरा ही कहा जा सकता यह! अभी बहुत कुछ करना होगा और देश के कर्णधारो को ये समझना होगा की भारत को विकसित देश बनाना हे तो सुरुआत गावो से ही करनी होगी ! क्योकि देश को खाना देने वाले दान दाता अन्न दाता गावो में ही बसते हे ! यहाँ देश की आत्मा निवास करती हे , यही देश का ह्रदय है।

Share This Post

Post Comment