जहाँ समस्त लोग मिलकर, प्रेम से एक साथ, एक गति से चलें, वह समाज है

जहाँ समस्त लोग मिलकर, प्रेम से एक साथ, एक गति से चलें, वह समाज है

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः तथ्यतः समाज है क्या? क्या मनुष्यों के समूह मात्रा को ‘समाज’ की संज्ञा देना सही होगा? क्या सहस्त्रों की भीड़ समाज है? यदि उत्तर सकारात्मक देते हैं, तो एक दुविधा पैदा होती है। वह यह कि फिर पशु-समुदाय को क्या उपमा देंगे? इसीलिए संस्कृति के भाषा-विज्ञों ने स्पष्ट कहा- ‘समम् अजन्ति जनाः अस्मिन् इति’- जहाँ समस्त लोग मिलकर, प्रेम से एक साथ, एक गति से चलें, वह समाज है। ठीक जैसे शरीर के अंगों के मध्य होता है। हाथों का भोज्य पदार्थ को उठाना, दांतों का चबाना, जिब्हा का निगलना, उदर का पचाना, हृदय का रक्त संचालन करना- कैसी विलक्षण सहभागिता है! सब अंग मिलजुल कर देह-तंत्र के लिए कार्य करते हैं। पूरी कटिबद्धता से अपना-अपना दायित्व निभाते हैं। फिर जो रक्त और ऊर्जा उत्पादित होती है, उसका मिल-बाँटकर उपभोग करते हैं। किन्तु यदि शरीर का एक भी अंग स्वार्थ सिद्धि पर उतारू हो जाए तो? स्वामी रामतीर्थ कहते हैं कि यदि दाहिना हाथ तर्क रखने लगे- ‘देखो, मैं सर्वाध्कि श्रम करता हूँ। पसीना बहाता हूँ! फिर मेरे पारिश्रमिक का आनन्द अन्य अंग क्यों लें? अतः अब मैं पोषक पदार्थों को मुख में नहीं, इंजैक्शन अथवा नश्तर से सीधे अपनी चर्म में डालूँगा। ऐसे में, देह की क्या गति होगी? क्या स्वयं यह स्वार्थी हाथ निरोगी रह सकेगा?’ इसी प्रकार मानव-समाज भी एक विराट देह के समान है। प्रत्येक नागरिक इसका अंग है। इन अंगों के बीच परस्पर साहचर्य ही इस देह के स्वास्थ्य की मौलिक शर्त है। कंधे-से-कंधा मिलाकर, हाथ-में-हाथ डालकर ही हम समाज को समुज्ज्वल उन्नति के पथ पर बढ़ा सकते हैं। मुझे याद आता है कि एक बार भारतीय विद्वान नानी पालकीवाह ने एक जापानी मिनिस्टर से पूछा था- ‘हम भारतवासी बुद्धि-मस्तिष्क की दृष्टि से जापानियों से किसी प्रकार भी कम नहीं। हमारे यहाँ मेधवी विद्वज्जनों की कतारें लगी हैं। बौद्धिक सम्पत्ति का अम्बार है। तथापि ऐसा क्यों कि भारत जापान के तुल्य उन्नति नहीं कर पाया?’ जापानी मिनिस्टर ने उल्लेखनीय उत्तर दिया, ‘ऐसा इसलिए, क्योंकि- महोदय, जापान में हम सभी समैत्री नागरिक हैं। किन्तु आप लोग इकाईयों का समूह मात्र है।’ एक रोचक शास्त्रीय कथानक है। एक बार प्रजापति ने देवों और असुरों- दोनों दलों को एक दावत पर आमन्त्रित किया। किन्तु दावत आरम्भ होने से पूर्व प्रजापति ने एक विचित्र आदेश दिया। वह यह कि प्रत्येक की बाजू से एक बड़ा कड़छा बाँध् दिया जाए। अब भोजन समक्ष था। किन्तु बाजू मुड़ नहीं सकती थी। फिर पदार्थ मुख तक कैसे लेकर जाएँ? दैत्य घोर दुविध में पड़ गए। मुख में भोजन डालने का भरसक प्रयास किया। किन्तु असफल रहे। क्षुधग्रस्त होकर पाताल लौट गए। फिर देवों को अवसर मिला। उनमें कहीं कोई अंतर्द्वंद्व नहीं था। बड़ी सहजता से सभी ने कड़छों द्वारा भोजन उठाया और समक्ष बैठे देव के मुख में डाल दिया। इस प्रकार सभी ने भरपूर खाया। आज हमने भी स्वार्थांध् होकर दैत्य-वृत्ति अपना ली है। यही कारण है कि हमारा हँसता-खेलता समाज धुंधकारी पाताल बनता जा रहा है। सभी अतृप्त और क्षुधग्रस्त हैं। इसलिए यदि स्वर्ग तुल्य समाज चाहिए, तो देवतुल्य व्यक्तित्व बनाने होंगे। देव-वृत्ति पैदा करनी होगी। और यह होना चाहिए- प्रत्येक व्यक्ति के स्तर पर! मुट्ठी भर व्यक्तित्वों के परिवर्तन से काम नहीं चलेगा। एक बार विनोबा भावे ने अपने कुछ छात्रों के सामने विश्व का मानचित्र फाड़ा और उसके टुकड़े विद्यार्थियों को पकड़ाते हुए कहा- ‘जरा, इस नक्शे को पुनः संयुक्त तो करो।’ सभी छात्र पूरी तन्मयता से कार्य में जुट गए। एक-एक खंड को यथास्थान जोड़ने का भरपूर प्रयत्न किया। किन्तु यह मानचित्र सही आकार नहीं ले पाया। अन्ततः आचार्य ने निर्देश दिया- ‘अब सभी टुकड़ों को पलटो और फिर जोड़ो।’ छात्रों ने निर्देशानुसार किया, तो पाया कि टुकड़ों के दूसरी तरफ मानव शरीर के अंग चित्रित थे। किसी पर आँख, किसी पर अँगुली आदि। बस अब क्या कठिनाई थी? छात्रों ने क्षण भर में शरीर के अंगो को जोड़ दिया। उलट कर देखा, तो दूसरी तरफ विश्व का मानचित्र भी सुगठित आकार पा चुका था। समाज की समस्या का यही समाधान है। यदि हम सम्पूर्ण समाज का उत्थान चाहते हैं, तो उसके प्रत्येक घटक का उत्थान करना होगा। समाज का घटक व्यक्ति है। एक-एक व्यक्ति को देव सदृश बनाइए। समाज स्वतः ही स्वर्गतुल्य बन जाएगा! दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, अखंड ज्ञान मासिक पत्रिका से उद्ग्रित।

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