धर्म, जाति, भाषा, समुदाय के नाम पर वोट मांगना गैरकानूनी

नई दिल्ली/नगर संवाददाताः जाति, धर्म, भाषा और समुदाय के नाम पर राजनीति करने वालों को सुप्रीमकोर्ट से बड़ी नसीहत मिली है। कोर्ट ने जाति, धर्म, भाषा और समुदाय के नाम पर वोट मांगने को गैरकानूनी करार दिया है। सात न्यायाधीशों की संविधानपीठ ने सोमवार को बहुमत से दिये फैसले में कहा है कि कानून में दिये गये शब्द ‘उसके धर्म’ में प्रत्याशी और विरोधी के धर्म के अलावा मतदाता का धर्म भी शामिल माना जाएगा। कोर्ट ने दो टूक कहा कि चुनाव धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है। इसमें धर्म की कोई भूमिका नही। व्यक्ति का भगवान से रिश्ता व्यक्तिगत होता है इन गतिविधियों में राज्य के शामिल होने की संविधान में मनाही है। इस फैसले के बाद किसी भी प्रत्याशी का किसी भी धर्मगुरु से अपने पक्ष में वोट की अपील कराना गैरकानूनी होगा। आजकल जबकि चुनावी राजनीति धर्म और जाति के इर्दगिर्द घूमती है सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। फिलहाल इसका सीधा असर पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में इसी महीने चुनाव की घोषणा होनी है। सुप्रीमकोर्ट की सात न्यायाधीशों की संविधानपीठ ने तीन के मुकाबले चार के बहुमत से यह व्यवस्था दी है। बहुमत का फैसला मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर, न्यायमूर्ति एमबी लोकूर, न्यायमूर्ति एसए बोबडे व न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव का है। जिसमें कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) की व्याख्या की है। बहुमत के फैसले में कहा गया है कि कानून को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जायेगा। धर्म, जाति, भाषा, समुदाय या वर्ग के आधार पर प्रत्याशी, उसके एजेंट या प्रत्याशी की सहमति से कोई और व्यक्ति अपील करता है तो वह गैरकानूनी है और उसे चुनाव का भ्रष्ट तरीका माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि संविधान की भावना धर्मनिरपेक्ष राज्य की है। राज्य का धार्मिक गतिविधियों में कोई लेना देना नहीं। चुनाव धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है। चुनाव प्रक्रिया में जाति, धर्म, भाषा, समुदाय, वर्ग आदि की भूमिका की मनाही है और ये चुनाव का भ्रष्ट तरीका मानी जाएगी। धर्म में प्रत्याशी के धर्म के अलावा मतदाता का भी धर्म शामिल माना जाएगा। हालांकि तीन न्यायाधीश आदर्श कुमार गोयल, न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ बहुमत के फैसले से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) का शाब्दिक अर्थ ही लिया जाएगा। उसका और कोई अर्थ निकालने का मतलब है कि कानून को पुन: लिखना। उन्होंने कहा कि धारा 123(में) सिर्फ प्रत्याशी का धर्म शामिल माना जायेगा उसे मतदाता के धर्म से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। असहमति रखने वाली पीठ का कहना है कि कानून में धर्म जाति वर्ग आदि पर चर्चा की मनाही नहीं है। इस पर चर्चा लोगों को लामबंद करने और उनकी उचित अपेक्षाओं के लिए होती है। इस पर रोक लगाने से लोकतंत्र कपोल कल्पना रह जाएगी। लोगों की उचित अपेक्षाएं और चिंताओं पर रोक लगेगी। बीस साल से लंबित था मामला ये मामला सुप्रीमकोर्ट में पिछले 20 साल से लंबित है। 1991-92 में बंबई हाईकोर्ट ने चुनावी भाषणों में हिंदुत्व शब्द के इस्तेमाल और हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने को चुनाव में भ्रष्ट तरीके माना था और शिव सेना व भाजपा के दिग्गज नेताओं सहित 10 लोगों का चुनाव रद कर दिया था। सुप्रीमकोर्ट ने 1995 में वह फैसला पलट दिया था। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि हिन्दुत्व शब्द सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं है। हिन्दुत्व शब्द भारतीय लोगों की जीवनशैली की ओर इशारा करता है। लेकिन भाजपा नेता अभिराम सिंह का मामला लंबित रहा। नारायण सिंह बनाम सुन्दर लाल पटवा का मामला भी लंबित था। हालांकि कोर्ट ने शुरू में ही साफ कर दिया था कि वह हिन्दुत्व के फैसले पर पुनर्विचार नही करेगा। कोर्ट ने कहा था कि हिन्दुत्व या धर्म का मसला उनके समक्ष विचाराधीन नहीं है।

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