भारत है ईश्वर का प्रत्यक्ष धाम- साध्वी अदिति भारती

भारत है ईश्वर का प्रत्यक्ष धाम- साध्वी अदिति भारती

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा पीतमपुरा स्थित रामलीला मैदान में आयोजित संस्थान के विशिष्ट गौ संरक्षण प्रकल्प कामधेनु को समर्पित श्रीमद देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ के चौथे दिवस गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या कथाव्यास साध्वी अदिति भारती जी ने दुर्गम वध का वर्णन किया। कथा का विश्लेषण करते हुए साध्वी जी ने आधुनिक और वैज्ञानिक तर्कों से सिद्ध करते हुए बताया कि वास्तव मे उस काल मे अनावृष्टि की समस्या आज की पर्यावरण समस्या से भिन्न नहीं है। पर्यावरण संरक्षण और गौ संरक्षण के मुद्दों जैसी समस्या पर काम करने के लिए माँ ने हमे भक्षक नहीं संरक्षक बना कर इस धरा पर भेजा था। माँ ने शताक्षी और शाकम्भरी रूप धारण कर समाज के समक्ष जल संरक्षण और वृक्षारोपण के सिद्धांत को भी रखा। आज के पर्यावरण संकट को यदि हम निर्मूल करना चाहते हैं तो हमे इन्ही सिद्धांतों को अपनाना होगा और साथ ही विशेष रूप से गौ संरक्षण की ओर बढ़ना होगा। इस सरस प्रसंग को सुन आए हुए श्रद्धालुओं ने माँ प्रकृति और विशेषकर गौमाता के संरक्षण का संकल्प उठाया। श्रीमद देवी भागवत महापुराण की सप्तम स्कन्द की गाथा का वर्णन करते हुए साध्वी जी ने तारकासुर नामक दैत्य के आतंक से त्रस्त हुई धरा के प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि तारकासुर का अस्तित्व केवल पौराणिक ही नहीं है आज भी हम समय के उस पड़ाव पर खड़े हैं जहाँ पाखंड रुपी तारकासुर ने हमे घेर रखा है। सत्य और असत्य की धूमिल हुई रेखाएं और हर ओर विस्तार पता फेक कल्चर- मार्किट में फेक प्रोडक्ट्स, फेक कम्पनियां, फेक फ़ूड, फेक सुन्दरता और यहाँ तक की अध्यात्म क्षेत्र में बढ़ते फेक गुरु मानव को भ्रमित कर रहे हैं। श्रद्धालुओं को सच्चे गुरु की कसौटी देते हुए भागवत में दर्ज हिमालय राज और स्वयं माँ भगवती के संवाद देवी गीता का वर्णन करते हुए बताया कि देवी माँ उद्घोष करती है- दिव्यं ददामि ते चक्षु पश्यमैव रूप्मैश्वरम् अर्थात जो दिव्य नेत्र प्रदान कर तत्क्षण मेरे दर्शन करवा दे वही पूर्ण गुरु है। कथा के अंतिम क्षणों में माँ पार्वती और भगवान शिव के विवाह में सभी ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया और इस विवाह उत्सव के गहन तथ्य को उजागर करते हुए साध्वी जी ने बताया जब गुरु की कृपा से शिव और शक्ति का मिलन इस देह के भीतर होता है तब विवेक रुपी कार्तिकेय जी के माध्यम से ही तारकासुरों का समूल नाश होता है।

Share This Post

Post Comment