अब 8वीं तक के बच्चाें के पास होने की गारंटी नहीं

देहरादून, उत्तराखंड/नगर संवाददाताः प्रदेश में भी अब आठवीं कक्षा तक के बच्चों को फेल न करने की नीति में बदलाव हो सकेगा। अब राज्य सरकार अपने हिसाब से यह निर्णय करने में सक्षम होगी कि वो इस नीति में कैसे बदलाव लाकर इसे लागू करे। उत्तराखंड का शिक्षा विभाग केन्द्र सरकार से शिक्षा के अधिकार कानून के कुछ प्रावधानों में बदलाव की मांग करता आ रहा है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कक्षा 8वीं तक के बच्चों को फेल न करने की नीति में बदलाव किए जाने की मांग। अब जब राज्य सरकार को नीति में बदलाव का अधिकार मिल गया है तो माना जा रहा है कि अब उत्तराखंड में 8वीं तक के बच्चों को फेल न करने की नीति में जल्दी बदलाव कर दिया जाएगा। दरअसल एक तरफ जहां राज्य सरकार शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के प्रयासों में जुटी है तो वहीं यह महसूस किया जा रहा है कि शिक्षा के अधिकार कानून के तहत फेल न करने की नीति शिक्षा की गुणवत्ता में सबसे बड़ी बाधक बनती जा रही है। शिक्षाविदों ने भी इस पर अपनी आपत्ति जताई थी कि इस प्रकार से गुणवत्ता नहीं सुधारी जा सकती है। फेल न करने की नीति के आधार पर राज्य में कक्षा 8वीं तक के बच्चों का केवल सतत और व्यापक मूल्यांकन ही किया जाना तय किया गया। बावजूद इसके राज्य सरकार की ओर से पहले ही केन्द्र को एक पत्र भेजा गया, जिसमें ये मांग की गई कि कक्षा 8वीं तक के बच्चों को फेल न करने की नीति में बदलाव किया जाए। पूर्व में हुई केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की बैठक में शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने भी केन्द्र के सामने यह बात उठाई। विभाग नं तर्क भी दिया कि बिना परीक्षा के बच्चों का मूल्यांकन कर शिक्षा में आ‌वश्यक गुणवत्ता सुधार करना काफी मुश्किल है। लेकिन अब राज्य के शिक्षा विभाग की राह आसान हो गई है। दिल्ली में हुई केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड़ की बैठक में ये तय किया गया कि इस दिशा में राज्य अपना फैसला कर सकेंगें कि वो क्या चाहते हैं। इसके साथ ही 5वीं व 8वीं कक्षा में परीक्षा आयोजित करने का अधिकार भी राज्यों को दिया जाएगा। केन्द्र कानून में संशोधन कर राज्यों को यह अधिकार देगा कि वो अपने राज्य के हिसाब से ये नीति निर्धारित कर सकते हैं।

 

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