प्रभु श्री राम का सकल जीवन अनुकर्णीय एवं प्रेरक

प्रभु श्री राम का सकल जीवन अनुकर्णीय एवं प्रेरक

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः श्री राम जी का सकल जीवन, उनका प्रत्येक पक्ष हमारे लिए अनुकरणीय एवं प्रेरक है। जीवन-अथाह में गुम नौकाओं के लिए ज्योतिर्मयी प्रकाश स्तम्भ है। जिन्होने सुग्रीव की डूबती नौका को सहारा दिया। अपनी सुग्रीव प्रति सच्ची मित्रता को निभाने का वचन दिया। संतमहापुरुष कहते है कि जीव का सच्चा सहायक एवं मित्र ईश्वर के सिवाय और कोई नहीं हो सकता। जो प्रभु से मैत्री करता है प्रभु उसे पूर्ण बना देते हैं। सुग्रीव मित्रता से पूर्व प्रभु की भेंट हनुमान जी से होती है एक ब्राह्मण के रूप में। जो प्रभु के साथ संस्कृत भाषा में वार्तालाप करते हैं। जब राम जी लक्ष्मण से पूछते हैं कि क्या इन आभूषणों को पहचानते हो तो लखन कहते हैं कि मैंने अपनी भाभी मां की मुख की ओर कभी देखा ही नहीं है। बस उनके नूपुरों को पहचानता हूँ क्योंकि उनके चरणों की नित्य पूजा करता हूँ। संस्कृति को परिलक्षित करता लक्ष्मण जी का यह वाक्य आज के समाज पर कुठाराघात कर रहा है। पुरातन आर्यावर्त भारत में रिश्तो की मर्यादा स्पष्ट रूप में देखने को मिलती थी जो आज कहीं लुप्त हो चुकी है। आज का मानव दानव बन अपनी वासनाओं की पूर्िर्त के लिये रिश्तों की डोर को काटने में भी शर्म महसूस नहीं करता। आज उसकी दृष्टि में मां, बहन, भाभी बेटी के रिश्तों को लेकर कोई मर्यादा नहीं हैं। हवस के शिकार मानव ने अपनी मर्यादा की सभी हदों को पार कर दिया है। वही आर्यावर्त की संस्कृति चरित्रा, ब्रह्मचर्य, संयम आदि की पवित्र कथा थी। परायी स्त्री को माता समान समझों मातृवत् परदारेषु सरीखे आदर्शो की जननी और परिपोषिका थी। हमारे मर्यादित इतिहास में ऐसे अलौकिक उदाहरण मिलते हैं जहां शिवाजी, छत्रासाल, दुर्गादास आदि भूपति विजिय राजाओं की रूपवंत बेगमों को भी माँ कहकर संबोधित करते थे। उन्हे सम्मान उनके आभिभावकों तक पहुंचा देते थे। ऐसा था भारत का निषकलंक स्वरूप और उनकी अनुकरणीय संस्कृति जिसके सामने सारा विश्व श्रद्धावत नमन करने को बाध्य था। यह वही देव भूमि है जिससे सम्पूर्ण भागों से जिज्ञासु लोग ज्ञान की खोज में आयावर्त में आये। वो भी कोई साधारण नही असाधारण संस्कृति से नैतिकता और चरित्रता का पाठ सीख कर गये। क्योंकि सम्पूर्ण विश्वांचल में भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसका केन्द्र बिन्दु पृथक है अद्वितीय और विलक्षण है यह केन्द्र है अध्यात्म। अध्यात्म ही भारत के हृदय का मर्मस्थल है, इस संस्कृति का मेरुदंड है। ईश्वर का लक्ष्य मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करना है। इसलिए युगों युगों से महापुरुष समाज कल्याण हेतु धरा पर अवतरित होते आए है! ऐसे ही प्रभु श्री राम ने अवतार ले असंख्य भक्त जैसे हनुमान, शबरी, केवट, जटायु इत्यादी को तारा। जब मानव प्रेम से नहीं समझता तो उसे धनुष उठाना ही पड़ता है। जैसे बालि को समझाया था। बालि धर्म की परिभाषा भूल चुका था। तभी तो जब प्रभु राम का बाण उसे लगता है तो वो चीतकार करता हुआ कहता है कि राम एक धर्मी को छुप कर मारना तुम्हें शोभा नही देता। परन्तु प्रभु बताते कि किसी के राज्य को बलपूर्वक छीन लेना और उसकी भार्या का हरण कर लेना कहाँ का धर्म, कहाँ का न्याय कहलाता है? प्रभु राम के शब्दों में कितना रहस्य छिपा हुआ है। आज भी तो मानव ऐसे दुष्कार्य करता हुआ स्वयं को धार्मिक कहलाता है, क्योंकि धर्म शब्द से तो परिचित है पर उसके रूप से अनभिज्ञ है। धर्म बाहर नहीं है वो तो हमारे भीतर है। ईश्वर को अपने अंतःकरण में देख लेना ही वास्तविक धर्म है।

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