सुस्त पड़ी भाजपा को न्यायलय की संजीवनी

पटना, बिहार/शिव शंकर लालः बिहार की राजनीति में दो खबरे ही आजकल ज्यादा चर्चा बटोर रही थीं। पहली शराबबंदी की दूसरी पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के बेल की। आज दोनों मामले में कोर्ट ने भाजपा को संजीवनी प्रदान कर दिया । पूर्व सांसद की बेल रद्द कर दी गई सुप्रीम कोर्ट में तो पटना में हाई कोर्ट ने शराबबंदी एक्ट को गैर कानूनी बता दिया। हालाँकि शराब बंदी पर लगी रोक कायम है कि नहीं यह अभी क्रिस्टल क्लियर नहीं है। कोर्ट के प्रत्येक फैसले पर चर्चा होती रही है और इन फैसलों पर भी चर्चा जरूर होगी लेकिन क्या चर्चा का बिंदु फैसले में दिख रही जल्दबाज़ी पर कोई टिका टिपण्णी होगी भी या फिर कोर्ट के सम्मान में झुकाये गए सर को कोर्ट कुछ और झुकाने को लेकर जल्दीबाज़ी में थी। अधिकांश नागरिको से पूछे तो शराबबंदी को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया ही प्राप्त होगा। फिर भी कोर्ट ने एक्ट को लेकर पहले भी नाराजगी जाहिर किया ही था अब तो एक्ट को गैर कानूनी ही मान लिया गया । अपराध की जननी शराब और उसके व्यापार से जुड़े तबके के लिए तो आज डबल दिवाली है क्योंकि ज्यादातर शराब व्यवासाई दक्षिणपंथी राजनीतिक धारा के समर्थक रहते आये हैं तो सेकुलर बाहुबली शहाबुद्दीन की पुनः जेल वापसी भी उन्हें आज़ाद हवा में सांस लेने जैसा ही प्रतीत हो रहा होगा। शहाबुद्दीन के बेल के रद्द करने की जल्दीबाज़ी और प्रशांत भूषण जैसे वकील का सहारा बहुत कुछ कहता है कोर्ट के फैसले के बाद । देश में कई दुर्दान्त अपराधी जिसमे बिहार के साथ साथ अन्य प्रदेशों के हिस्ट्रीशीटर शामिल हैं जमानत पर बाहर हैं लेकिन प्रशांत भूषण जी को उनके बाहर होने पर कोई बेचैनी नहीं हुई । क्या नीना कोडनानी के मामले में उन्होंने ऐसी पहल की थी । चन्दा बाबु दो धुर विवादित ज़मीन के टुकड़े के बदले उनके नाम से मीडिया में लगातार जारी रहने और वायरल होने वाले चिठ्ठी में रंगबाजी मांगने का जिक्र क्यों है। कोर्ट ने जब शहाबुद्दीन को जेल के अंदर रहते दोषी मान लिया तो तब के तत्कालीन जेल प्रशासन को कैसे छोड़ दिया । एक ही मामले में कोई दोषी और कोई निर्दोष कैसे।

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