चंचल मन को नियंत्रित करने के लिए पूर्ण सतगुरु की शरणागती होना होगा दृ श्री आशुतोष महाराज जी

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः यह पूरी कायनात पारब्रह्म परमात्मा की रचना है। वह ही सब के अन्दर समाया हुआ है। दिन और रात की आंख-मिचोली के साथ वह सृष्टि का संचालन कर रहा है। पर सब जगह व्याप्त होने के बावजूद भी वह अदृश्य है। यह अपने आप में बड़ा ही विचित्र खेल है। किसी भी खेल में एक की हार और एक की जीत होती है। और हारने वाला मन के कारण रोता है। और जीतने वाला मन के कारण प्रसन्न होता है। पर अध्यात्म में मन के कारण रोना और खुश होना दृ दोनों को ही बौरापन की निशानी कहा गया है। मन से उपजे इस बौरापन के कारण ही आत्मा को कई योनियों के जन्म-मरण के चक्रव्यूह में घूमना पड़ता है। यह बौर पन संसार की धन दौलत इकठ्ठा करने का, जगत की वाह-वाह प्राप्त करने का, संसार के रसों को भोगने का या खाने-पीने का, किसी भी प्रकार का हो सकता है।
संत महापुरुष चेतावनी देते हुए कहते हैं कि “ऐ इन्सान! सावधान हो जा, कल तेरा मन इस संसार के विषय-वासनाओं के पीछे बौरा न जाये। यदी तू मन के पीछे लग गया तो वह तुझे इस मायावी जगत में भटका देगा। मन बड़ा ही चंचल है और एक पल में अपनी दिशा बदल लेता है। इसकी हालत उस मक्खी की तरह है जो कुछ समय पहले मंदिर के प्रसाद पर बैठी थी और कुछ समय बाद गंदगी कीटोकरी पर जा बैठती है। यह मन भी इसी तरह करता है। एक पल में यह हमें शरीफ़ इन्सान बना देता है और दूसरे ही पल बदमाश। इसकी चंचलता को समझाते हुए महापुरुष लिखते हैं
“मन के मते नाचालिये, मनके मते अनेक द्य मन के मारे मर गए काज़ी मुल्ला शेखद्यद्य”
यह संसार दृष्टा को अपनी ओर आकर्षण करता है। परन्तु जैसे ही उसे गहराई से देखा जाए तो इसका रंग उतरने लगता है। इन्सान अज्ञानता के कारण मोह के वश में होकर दुनियादारी रिश्ते-नातों और पदार्थों के रस-भोग में मस्त हो जाता है। यही उसके दुखों और रोगों का कारण बनता है। माया के अधीन हो मन माया की बात सुनकर ही राज़ी होता है। इस मायावी जगत की चमक अच्छे-अच्छों के मन को बोरा देती है। हर जगह हर समय इसका प्रभाव अपना असर छोड़ रहा है जिसे इन्सान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के अधीन कबूल करता है। जैसे तेज़ धूप में चलते समय हम सूर्य को तो नही ढक सकते पर धूप से बचने के लिये छाता जरूर ले सकते हैं। भाव इस संसार के विषय हमें आकर्षण अवश्य करेंगे जिनकी ओर झुकना मन का कुदरती स्वभाव भी है। इसलिये पतन से बचने के लिये हमें ब्रह्मज्ञान का कवच पहनना बहुत ज़रूरी है। इस चंचल मन को नियंत्रण में रखने के लिये एकपूर्ण सत गुरु की शरण में जा कर ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति करो। संसार में रहते हुए हर जीव और इन्सान पर दया करो, प्यार करो और सेवा कर के अपना धर्म निभाओ। यही तरीका है मुक्ति को प्राप्त करने का। अपने मूल उस परम पिता परमात्मा को प्राप्त करने का यही शुभ अवसर है।

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