आंदोलनकारी बेटे को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए भटक रही बूढ़ी मां

देहरादून, उत्तराखंड/नगर संवाददताः उत्तराखंड राज्य बनाने के लिए जिन लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी उनको राज्य निर्माण के बाद शहीद का दर्जा मिला और परिजनों को आंदोलनकारियों को मिलने वाली सुख सुविधाएं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके परिजन आज भी उनको शहीद का दर्जा दिलाने के लिए दर दर भटक रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है. राज्य आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाने की मांग को लेकर एक जुलूस के दौरान रामेश्वरी देवी का बेटा शहीद गंभीर सिंह कठैत की आग में झुलसने से मौत हो गई थी. जिसके बाद उसे राज्य आंदोलनकारी का दर्जा तो मिला और उसके नाम पर कई घोषणाएं भी हुई, लेकिन आज तक नई टिहरी में उसके नाम पर बने पार्क में मूर्ति का अनावरण नहीं हो पाया है और गांव में स्कूल में गंभीर सिंह कठैत के नाम के आगे शहीद नहीं लिखा गया है जिससे आज परिजनों में खाशा आक्रोश है. आंदोलनकारी गंभीर सिंह कठैत की मां रामेश्वरी देवी अपने बेटे को शहीद का दर्जा दिलाने की मांग और पार्क में बनी मूर्ति का अनावरण कराने की मांग को लेकर करीब 12 सालों से सीएम से लेकर डीएम के चक्कर काट चुकी है और इन दिनों रोजाना करीब साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी तय जिला कलेक्ट्रेट पहुंचती है, लेकिन वहां उन्हें कोई अधिकारी नहीं मिलता जिस कारण हताश होकर अब वो आत्मदाह करने की बात कह रही हैं. करीब डेढ़ हफ्तों से लगातार रामेश्वरी देवी डीएम से मिलने के लिए कलेक्ट्रेट पहुंचती है, लेकिन डीएम के नहीं होने से वो हताश होकर फिर वापस अपने घर लौट जाती हैं. वहीं, एडीएम साहब का कहना है कि उनके संज्ञान में ये मामला अभी आया है. जिन लोगों ने उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए अपने प्राणों की चिन्ता नहीं कि उन्हें आज तक शहीद का दर्जा नहीं मिल पाना उनका और उनके परिजनों का अपमान है. एसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या रामेश्वरी देवी को अपने बेटे को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए एक बार फिर से आंदोलन करना पड़ेगा.

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