परमात्मा मानने का नहीं, जानने का विषय है – सुश्री आस्था भारती जी

परमात्मा मानने का नहीं, जानने का विषय है – सुश्री आस्था भारती जी

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः बुराडी़, दिल्ली में दिनांक 05 से 11 सितम्बर, 2016 तक ‘श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ’ का अद्भुत, भव्य व विशाल आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के चतुर्थ दिवस पर भगवान की अनन्त लीलाओं में छिपे गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को कथा प्रसंगों के माध्यम से उजागर करते हुए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक एवं संचालक श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या भागवताचार्या महामनस्विनी विदुषी सुश्री आस्था भारती जी ने आज बाल-लीला के विभिÂ प्रसंगों व गोवर्धन पूजा प्रसंग को प्रस्तुत किया। एवं इनमें छिपे हुए आध्यात्मिक रहस्यों से भक्त-श्रद्धालुओं को अवगत कराया। अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।। अर्थात् इस संसार के मूढ़ बुद्धि लोग मुझे मनुष्य शरीर में देखकर साधारण मनुष्य समझ लेते हैं पर वे मेरे परम भाव को नहीं जानते कि मैं ही सभी भूत प्राणियों का स्वामी हूँ। गोकुल की गलियों में दौड़ते हुए इस गोप बालक को देखकर कौन कह सकता है कि वे परमात्मा हैं। वन में अपनी पत्नी के खो जाने पर विलाप करते हुए वृक्षों व लताओं से अपनी पत्नी का समाचार पूछने वाले वनवासी प्रभु राम को देखकर भला कौन कह सकता है कि यही परमात्मा हैं। परमात्मा की लीलाएं सदैव मनुष्य के लिए रहस्य बन रहीं हैं क्योंकि वह परमात्मा को अपनी बुद्धि के द्वारा समझना चाहता है, जो संभव नहीं। इसलिए रावण, कंस, दुर्योधन जैसे लोग भी प्रभु की लीलाओं से धोखा खा गए। प्रभु की प्रत्येक लीला में आध्यात्मिक रहस्य छिपा होता है, जिनका उद्देश्य मनुष्य को आध्यात्मिक मार्ग की ओर प्रेरित करना है। जब एक मनुष्य पूर्ण सतगुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करता है तब उसके अंदर में ही इन लीलाओं में छिपे हुए आध्यात्मिक रहस्य प्रकट होते हैं तथा पूर्ण सतगुरु की कृपा से ही वह इन रहस्यों को समझ पाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के घरों से माखन चोरी की, इस घटना के पीछे भी आध्यात्मिक रहस्य है। दूध का सार तत्व माखन है, उन्होंने गोपियों के घर से केवल माखन चुराया अर्थात सार तत्व को ग्रहण किया और असार को छोड़ दिया। प्रभु हमें समझाना चाहते हैं कि सृष्टि का सार तत्व परमात्मा है। इसलिए असार संसार के नश्वर भोग पदार्थों की प्राप्ति में अपने समय, साधन और सामथ्र्य का अपव्यय करने की अपेक्षा हमें अपने अंदर स्थित परमात्मा को प्राप्त करना चाहिए। इसी से जीवन का कल्याण सम्भव है। गोवर्धन पूजा प्रसंग का वर्णन करते हुए साधवी जी ने बताया कि गो शब्द का अर्थ है धरती और वर्धन का तात्पर्य है बढ़ाना अर्थात् धरती का संवर्धन करना। इसी के अंतर्गत उन्होंने संस्थान के प्रकृति संरक्षण कार्यक्रम ‘संरक्षण’ की चर्चा करते हुए बताया कि आज अनेक आयोजनों द्वारा समाज में प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता लाई जा रही है। इस कथा प्रसंग में भगवान श्री कृष्ण की अनन्त लीलाओं का मार्मिक वर्णन करते हुए सुश्री आस्था भारती जी ने कथा को रोचकता प्रदान की।

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