श्री गणपति तत्त्वरूप में विवेक के देवता हैं – श्री आशुतोष महाराज जी

श्री गणपति तत्त्वरूप में विवेक के देवता हैं – श्री आशुतोष महाराज जी

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नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादव: ‘गणपति बाप्पा मोरया!’ ‘गणपति बाप्पा मोरया!’…. महाराष्ट्र की गलियों में आप इन जय-धुनों को इस सितम्बर माह भरपूर रूप से सुन सकते हैं। जैसे-जैसे गणेशोत्सव की पदचाप बढ़ती है और यह महापर्व निकट आता है, वैसे-वैसे यह जयधुन उँची और प्रखर होती चली जाती है- ‘गणपति बाप्पा मारेया!’  लेकिन क्या जो हम कहते हैं, उसका सही अर्थ भी समझते हैं? जो हम करते हैं,  उन क्रियाओं में छिपे रहस्यों को भी जानते हैं?  बंधुओं भला बाहरी छिलकों से किसे स्वाद मिला है?  मीठा रस तो थोड़ा गहराई में उतर कर ही मिलता है। ‘गणपति बाप्पा मोरया’ भी एक ऐसा ही सांकेतिक फल है। बोलने में निःसन्देह मीठा है। मगर इसकी असली मधुरता इसका गूढ़ अर्थ जानने से मिलती है। क्या है इसका गूढ़ार्थ?  ‘बाप्पा’ प्यार से भगवान गणपति के सगुण स्वरूप को कहा गया है। ‘मोरया’ जिसे मराठी में ‘समोर या’  भी कहते हैं,  का मतलब होता है ‘सामने आ!’  इसलिए ‘गणपति बाप्पा मोरया’ का पूरा अर्थ हुआ- ‘हे गणपति देवा। तू सगुण रूप में हमारे सामने आ! तू साकार होकर हमारे जीवन में उतर!’  ऐसा नहीं कि बाप्पा ने हमारी इस विनय को हमेशा अनसुना किया हो। मुद्गल पुराण में विघ्नविनाशक गणपति के अनेक अवतारों का वर्णन है,  जिनमें वे सगुण रूप धरकर हमारे सामने आए। अगर उन अवतारों के केवल नाम-नाम भी हम यहाँ लिखेंगे, तो न जाने- ‘कितने पृष्ठ भर जाएँगे?’ इसलिए कह सकते हैं कि अनंत बार बाप्पा ने हमारी ‘गणपति बाप्पा मोरया’ की अर्जी को स्वीकार किया है। इस माह गणेशोत्सव के उपलक्ष्य में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आपके लिए श्री गणपति की अनंत प्रेरणाओं को लेकर आया है। प्रिय पाठकगणों,  जरा आप इस वर्णन को ध्यान से पढि़एगा। क्योंकि इसी के बीच से आपको एक रहस्यात्मक सूत्र मिलेगा,  जिसके क्षरा आप आज भी गणपति बाप्पा को अपने जीवन में प्रकट कर सकते हैं। उन अवतारों को निरूपण इस प्रकार है- यह एकाक्षरी मंत्र क्या है?  पुराणों के अंतर्गत देवी पार्वती भी भगवान शिव से जिज्ञासा करती हैं- ‘भगवन्, कृपा कर मुझे एकाक्षरी मंत्र का रहस्य बताइए।’  उत्तरस्वरूप महादेव कहते हैं- एकाक्षरस्य मंत्रस्य कवचं देवी दुर्लभम्। यो धारययेन्महेशानि न विघ्नैरभिभूयते।। गणेशहृदयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदम्। हे देवी! यह एकाक्षर मंत्र कवच रूप है अर्थात् महारक्षक है तथा अति दुर्लभ है। इसे धारण करने वाले के जीवन में कभी विघ्न नहीं व्यापते और उसे सर्वसिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। माँ पार्वती ने पुनः पूछा – ‘परन्तु भगवन्! इस मंत्र को कहाँ से अथवा किसके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है?’ महादेव ने कहा- ‘दातव्यं भक्ति युक्ताय गुरुदेव पराय च….’ अर्थात् जो सज्जन भक्तियुक्त होकर सद्गुरु के परायण हो जाता है, उसे ही वे ब्रह्मज्ञान प्रदाता गुरुदेव यह मंत्र प्रदान करते हैं। वास्तव में, यह महिमावान एकाक्षर हिन्दी वर्णमाला का कोई ‘स्वर’ या ‘व्यंजन’ नहीं है। इसे वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह तो वही आदिनाम है, परमशब्द, word है, जो सृष्टि के आदिकाल में भी था। इसी आदिनाम से सृष्टि का विस्तार हुआ और हमारे प्राणों को संचालित कर रहा है। एकाक्षर- ‘एक’+‘अक्षर’, याने वह ‘एक’ सत्ता जो ‘अ’+‘क्षर’ है, जिसका कभी क्षरण नहीं होता। सारांशतः एकाक्षर, उस ‘एक अविनाशी’, ‘एक अनश्वर’ सत्ता को ही कहा गया। सद्गुरु अपनी महती कृपा से (हमारे कानों में कोई स्वर नहीं डालते, अपितु) ब्रह्मज्ञान प्रदान कर इसी अविनाशी ब्रह्म को या आदिनाम रूप तरंग को हमारे भीतर प्रकट कर देते हैं। इस अलौकिक ब्रह्मज्ञान की साधना के फलस्वरूप ही साधक में श्री गणेश का प्रकट्य होता है। श्री गणेशः तत्त्वतः क्या हैं? ज्ञानेश्वरी की शुरूआत में ही श्री ज्ञानेश्वर महाराज गणपति वंदना करते हुए लिखते हैं- ॐ नमोजी आद्या। वेदप्रतिपाद्या। जय जस स्वसंवेद्या। आत्मरूपा। देवा तुचि गणेशु। सकलार्थ मति प्रकाशु। अर्थात् हे गणेश देवा! आपको नमस्कार है। आप सृष्टि के आदिस्त्रोत हैं, वेदों के प्रतिपादक है, सबके आत्मस्वरूव हैं। आपके प्रकट होते ही बुद्धि में सकल अर्थ प्रकाशित हो जाते हैं। इसी प्रकार ‘दासबोध्’ के मंगलाचरण में स्वयं समर्थ रामदास जी भी कहते हैं- नमो ऐसिया गणेंद्रा। विद्या प्रकाशे पूर्ण चंद्रा। जया चेनी बोध् समुद्रा। भरिते डाटे बळे। हे गणेन्द्र! नमन है आपको। आप विद्या प्रकाशित करने वाले पूर्ण चंद्रमा हैं। जिसके कारण हृदय में ‘बोध्’ का समुद्र लहरा उठता है। अतः श्री गणपति तत्त्वरूप में ‘सुबोध्’ या ‘विवेक’ के देवता हैं। श्री गणपति का प्राकट्य अंतर्हृदय में आत्मबोध् का जागरण है। विवेक का प्रकाश अथवा आत्म-ज्ञान होते ही हमारे भीतर का अज्ञान जडि़त साम्राज्य खंड-विखंड होने लगता है। उसमें निवास कर रहे असुर त्राहि-त्राहि कर उठते हैं और परास्त होते चले जाते हैं। उनकी दशा और दिशा दोनों ही  सकारात्मक होती चली जाती है। यही है, अंतहृदय में श्री गणपति का अवतरण! तो बोलिए, अंतरासुरों के संहारक आत्मबोधरूप श्री गणपति की जय! ब्रह्मज्ञान हृदय में ‘ब्रह्म’ के प्रकाश-स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन करना है। हर युग में पूर्ण गुरुओं ने जिज्ञासुओं को इसी ज्ञान में दीक्षित किया है। इस प्रक्रिया में वे शिष्य के दिव्य दृष्टि खोलकर उसे अंतर्मुखी बना देते हैं। शिष्य अपने अंतजर्गत में ही अलौकिक प्रकाश का दर्शन और अनेक दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करता है। वर्तमान में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक श्री आशुतोष महाराज जी समाज को इसी ब्रह्मज्ञान में दीक्षित कर रहे हैं।

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