मानव का संस्कार ही विश्व को बना सकेगा सरस व सुंदर

मानव का संस्कार ही विश्व को बना सकेगा सरस व सुंदर

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से जयपुरमें श्रीमद् भागवत महा पुराण साप्ताहिक कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। जिस के अंर्तगत सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री वैष्णवी भारती जी ने माहात्मय के अंर्तगत बताया भगवान श्री कृष्ण में जिनकी लगन लगी है। उन भावुक भक्तों के हृदय में प्रभु के माधुर्य भावको अभिव्यक्त करने वाला उनके दिव्य रस का आस्वादन करवाने वाला यह सर्वोत्त्कृष्ट महापुराण है। जिसमें वर्णित वाक्य ज्ञान, विज्ञान, भक्ति एवं उसके अंग भूत साधन चतुष्टय को प्रकाशित करने वाला है तथा माया का मर्दन करने में समर्थ है। श्री मद् भागवत भारतीय साहित्य का अपूर्व ग्रंथ है। यह भक्ति रस का ऐसा सागर है जिस में डूबने वाले को भक्ति रूपी मणि-माणिक्यों की प्राप्ति होेती है। भागवत कथा वह परम तत्व है जिसकी विराटता अपरिमित व असीम है। वह परम तत्व इसमें निहित है जिसके आश्रय से ही इस परम पावन भू-धम का प्रत्येक कण अनुप्राणित और अभिव्यंजित हो रहा है। यह वह अखंड प्रकाश है जो मानव की प्रज्ञा को ज्ञान द्वारा आलोकित कर व्यापक चिंतन के द्वार खोल देता है। यह वह कथा है जो मानव के भीतरी दुर्बलता के रूपान्तरण हेतु अविरल मन्दाकिनी के रूप में युगों युगों से प्रवाहित होती आ रही है।उन्होने बताया कि भागवत महापुराण की कथा समाज के प्रत्येक व्यक्ति का प्रतिनिध्त्वि करती है। आज के समाज की हर समस्या का समाधान इसमें ही निहित है। आप देखे आत्मदेव की कथा में उसका परिवार है। पत्नी धुंधली, पुत्रा धुंधकारी, गोकर्ण है। धुंधकारी जोकसंग के कारण अपने माता पिता को दुःख देता है। वेश्याओं के संग कर भोग में संलग्न हो जाता है। भागवत की कथा आज के परिवेश को ही दर्शाती है। आज संस्कार विहीनता के वातावरण में पल रही युवा पीढ़ी की यही दशा है। जिस प्रकार मिठाई से मिठास, इक्षुदण्ड से रस, दुग्ध से घी निकाल लेने से ये निःसार, तेज ही न हो जाते हैं। वैसे ही मानव के जीवन से संस्कार नहीं तो वहते जहीन हो जाता है। इन संस्कारों के अभाव में युवा वर्ग पश्चिमी सभ्यता का अंधरूनी करण कर रहा है। भारतीय परंपराओं का उपहास करना और उन्नति के नाम पर नैतिकता का परित्याग करना उनके जीवन की उपलब्धि बन गयी है। फिल्मी सितारें, माडल आदि को उन्होंने जीवन का आदर्श बनाया है। इनमें से किसी का परिधन इन को भाता है तो किसी की चाल-ढाल। स्मरण रहे युवाओं द्वारा चुने इन आदर्शों ने व्यक्तिगत कितनी भी प्राप्तियां कर ली हों। पर उनके त्याग, सेवा व परोपकार के कोई बड़े आदर्श स्थापित नहीं किये। उनकी नकल करने से हमारे परिधन, चाल-ढाल में परिवर्तन अवश्य आ सकता है। किंतु बाहरी चमक दमक से बात नहीं बनती। इस से चिंतन बदल सकता है, चरित्रा नहीं। संस्कारों की आवश्यकता है जो विश्व रूपी बगिया को सरस, सुंदर, सुरभिमय बना सकें। क्योंकि जहां संस्कार हैं वहां उच्च, श्रेष्ठसमाज की परिकल्पना साकार होती है। तदुपरांत भागवत के प्रथम स्कंध का वर्णन किया गया। जिसमें वेद्व्यास जी के असंतोष का विवरण आता है। उन्होंने सत्राह पुराणों की रचना से संसार को भक्ति मार्ग दिखाया परंतु स्वयं काम नतमस से ग्रसित रहा। नारदजी की प्रेरणा से ज्ञात हुआ कि प्रभु शब्दों का विषय नहीं अपितु दर्शन का विषय है। वृक्ष के सर्वांगीण विकास के लिये मूल का सिंचन आवश्यक है। उसी प्रकार जीवन के विकास हेतु आत्मतत्व का प्राप्त करना परम आवश्यक है। यह प्रकरण हमें परमात्मा की प्रत्यक्षानुभूति करने की सीख देता है।

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