अशांत मन को ब्रह्मज्ञान की ध्यान-साधना से शांत करें – श्री आशुतोष महाराज जी

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः कितना सरल है न मुँह खोलना और बस दो कटु पंक्तियाँ बोल देना। सामने वाले के दिल को दुःखाकर अकड़ कर चल देना। पर जानते हो, आपके इस मदोन्मत्त बर्ताव पर प्रकृति सरल प्रतिक्रिया नहीं करती। बदले में, सारा ब्रह्माण्ड आपको घूरता है। चेतवानी देता है। आपके सीने को भेदने के लिए दो धारदार कटु पंक्तियाँ तैयार करके रख लेता है। फिर मौका पाते ही, उनका निशाना आपकी ओर साधता है। तब आपको भी दिल मसोस कर दर्द के कड़वे घूँट पीने ही पड़ते हैं। यह प्रकृति का अटल नियम है। एक गाँव की बात है। एक बच्चा अपने विद्यालय की तरफ जा रहा था। रास्ते में घना जंगल पड़ता था। सहसा उसे कुछ सरसराहट सी सुनाई दी। वह चीखा- ‘तू कौन है?’ प्रत्युत्तर में यही गूँज सुनाई दी- ‘तू कौन है?’ लड़कपन में किशोर पुनः चिल्लाया- ‘ओए! एक बार सामने तो आ।’ प्रतिवाद भी समान ही था। वही शब्द, वही स्वर, वही शैली! बालक थर्राया, दौड़कर लौटा और माँ के आँचल में पनाह ली। माँ ने समझाया- ‘बेटे, तू डरता क्यों है? वन तो तेरा मित्र है। अच्छा, कल तू उसे मित्रावत् पुकारना।’ अगले दिन वन में किशोर उच्च स्वर में बोला- ‘कैसे हो तुम मित्र?’ प्रतिध्वनि हुई- ‘कैसे हो तुम मित्रा?’ यह वन एक छोटा-सा माॅडल है, इस सम्पूर्ण सृष्टि का। आप जैसी ध्वनि उच्चारेंगे, वैसी ही सुनेंगे। वायुमंडल आपके हर शब्द, उसकी सख्त-नरम, ऊँची-नीची शैली, हर बारीकी को सौक लेता है। फिर कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो तरसों एक न एक दिन उसकी प्रतिध्वनि आपको सूत समेत जरूर लौटाता है। फिर चाहे यह ‘एक दिन’ आपके आगामी जन्मों में ही क्यों न आए। हर गलत विचार, हर घृणापूर्ण शब्द, जो बेशक तुमने एक गहन गुफा में छिपा कर बोला हो, जमा हो जाता है। फिर एक दिन प्रचंड वेग के साथ, किसी कलेश के रूप में, तुम्हारे पास लौटकर आता है। अगर तुम किसी को घृणा और ईष्र्या का दान दोगे, तो भारी सूत के साथ उसी का प्रतिदान पाओगे। चूंकि उन्होंने हवा का झौंका बोया है, इसलिए उन्हें तूफान झेलना पडे़गा। यह बात शास्त्रीय या दार्शनिक ही नहीं, वैज्ञानिक भी है। शोध कत्र्ताओं का कहना है कि यदि 50 लोग 3 घंटे तक लगातार एक शब्द मुखरित करते रहें, तो छह खरब वाॅट उर्जा उत्पादित हो सकती है। मतलब कि जब हम कोई भी शब्द बोलते हैं, तो उसका ब्लू प्रिंट उर्जा तरंगों के रूप में वायुमंडल में ठहर जाती है। दूसरा, ये शब्द-तरंगे कभी भी नष्ट नहीं होती। इस प्राकृतिक नियम पर वैज्ञानिकों को इतना अडिग भरोसा है कि इसके आधार पर वे द्वापर-युगीन गीतोपदेश की तरंगों को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मानना है कि वर्ष पूर्व श्री कृष्ण ने जो संस्कृत श्लोक उच्चारे थे, वे आज भी सूक्ष्म तरंगों के रूप में। वायुमंडल में तैर रहे है। यदि इन तरंगों को कैद कर डी-कोड कर लिया जाए, तो हम आज भी श्री जगद्गुरु की प्रत्यक्ष वाणी को सुन सकते हैं। अतः जिन शब्दों ने एक बार हमारे मुख से आकर ले लिया, उनकी उर्जा-तरंगे अंतरिक्ष में सदा अमर रहती हैं। इसके अलावा, इस तरंग-लीला का एक और बड़ा अनोखा पक्ष है। विज्ञान के अनुसार उर्जा-तरंगे एक बंद घेरे में घूमा करती हैं। आप एक विद्युत-सर्केट की जाँच करके देख लें। उसमें विद्युत सिग्नल जिस बिंदु से शुरू होगा, घूमकर उसी पर रुकेगा। यही आदत हमारी शब्द-तरंगों की भी है। क्योंकि आइंस्टीन की थियोरी आॅफ रिलेटीविटी बताती है कि ब्रह्माण्ड भी एक बंद सर्किट ही है। इसकी एक गहरी सच्चाई है- इसके अंतर्गत ब्रह्माण्ड को बंद घेरों से ही बना हुआ बताया गया है। इसलिए यदि हम ब्रह्माण्ड के एक बिंदु से यात्रा करनी शुरू करें, तो एक न एक दिन पुनः इसी बिंदु पर ही पहुँचेंगे। ठीक इन्हीं बंद घेरों में हमारी शब्द-तरंगे भी चक्कर काटती हैं। अर्थात् जो तरंगें हमसे निकली है, एक दिन हमारे पास वापिस लौट कर आएँगी ही आएँगी। यह एक प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य है। इसलिए समझ लें, हम सभी शीशमहल में रहते हैं। हमारे चारों ओर शीशे ही शीशे हैं। इनके बीच रहते हुए अगर हम गुर्राएँ और मुस्कुराहट की आशा रखें तो यह हमारी मूर्खता ही होगी। मुस्कुराएँगे तो मुस्कुराहट मिलेगी। गुर्राएँगे तो गुर्राहट। हम अपने दिए से बच नहीं सकते। इसलिए हितैषियों ने इस सूक्ष्म विज्ञान को बड़े सरल ढंग से हमारे लिए पिरोया-

चार वेद छह शास्त्रा में, बात मिली है दोए।
सुख दीने सुख होत है, दुःख दीने दुःख होए।।
यही हिन्दु-शास्त्रिायों का कर्मवाद है। बाइबल का जानामाना सूत्र है- तुम दूसरों से वैसा ही व्यवहार करो, जैसा कि तुम उनके द्वारा स्वयं के लिए चाहते हो। जिस ने वायुमंडल में संकलित हमारी शब्द-तरंगों को ही ‘स्वर्ग की जमा पूंजी या खजाना’ कहा। वे उपदेश देते हैं- ‘इस पृथ्वी पर खजानों को क्या जोड़ना, स्वर्ग की उस अक्षय राशि की चिंता करो, जो कभी नष्ट नहीं होती।’ जैन तीर्थंकर भगवान महावीर ने इस जीवन-सत्य को इस प्रकार रखा- जिसे तू मारना चाहता है, वह तू ही है!
जिसे तू शासित करना चाहता है, वह तू ही है!
जिसे तू परिताप देना चाहता है, वह तू ही है!

अब सोच लीजिए, हम किसी दूसरे का दिल दुःखा कर स्वयं के लिए दर्द का सामान जोड़ते हैं। यह नादानी क्यों करते हैं? यह एक महाप्रश्न है। हो सकता है, इसके जवाब में शांत मन किसी प्राणी को कष्ट नहीं देता। मैं अशांत हूँ, इसलिए दूसरों को भी अशांत करने की कोशिश कर डालता हूँ। मै क्या करूँ? स्वभाववश विवश हूँ। परन्तु याद रखें, हम इस बहाने की पतली गली से बचकर नहीं निकल सकते। प्रकृति दंड बरसाने से पहले हमारी विवशता या अज्ञानता नहीं देखेगी। सलामती इसी में है भाई कि हम जुबान को संभालना सीखें। मधु-घुली भाषा बोलें। यदि अशांत मन विघ्न डालता है, तो उसे ब्रह्मज्ञान से प्राप्त आदिनाम के सुमिरन और ध्यान-साध्ना से शांत करें। यही शांत रहने और शान्ति बिखेरने की कुंजी है।

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