बाढ़ के शोर के बीच बाज़ार का उन्मादी होना

पटना, बिहार/शिवशंकर लालः पिछले 48 घंटो से राजधानी वासियों का डर अपने चरम पर है समाचार माध्यमो का लगातार चीखना चिल्लाना गंगा को पतिपावन से उन्मादी और न जाने किन किन विभीषणों से अलंकृत किया जा रहा है। तस्वीरों के द्वारा पानी इन इलाकों में घुसा तो वहां फैला इलाके में गंगा का पानी घुसा पूरा इलाका जलमग्न हो उठा। गंगा की उन्मादी लहरो ने यहाँ कहर बरपाया तो वहां लोग कमर भर पानी में डूबे है। इत्यादि खबरों से शहर को इतना भयभीत कर दिया गया कि लगा जैसे अब जल प्रलय होने को ही है। हालात ऐसे बदले की अपने घर में बूढ़े माँ बाप को छोड़ शहर से बाहर रहने वाले लोग विचलित होकर आस पड़ोस वालो को फोन कर माता पिता का ध्यान रखने की विनती करने लगे। सिलसिला मास हिस्टिरिया में तब्दील होने लगा, लोग बाग़ डर के आगोश में आ गए जैसे लग किसी भी क्षण जीवन दायनी गंगा का पानी उनकी घरो को अपनी आगोश में ले लेगा। डर के माहौल और अपनों की चिंता के बीच बाजार भी सक्रिय हो गया और मुनाफाखोर लोगो ने नोट पीटने खातिर इस माहौल को मुफ़ीद मान लिया। फिर क्या था निम्न वर्गीय इलाको में स्थित परचुनियें जबरिया महंगा कर खाने पीने की वस्तुएं बेचने लगे। जबरन मार्केट में बिस्किट मैगी और अन्य रेडी टू इट वस्तुओ की उपलब्धता कम कर दो से चार पांच रुपये तक दाम बढाए गए। जबरिया कायम हुए इस पैनिक में गंगा किनारो से सटे इलाको में दूध पावरोटी चाय पत्ती नमक रिफायनी समेत बिस्किट मैगी की बिक्री में जबरदस्त उछाल आया गया तो मुनाफा खोरों ने भी नोट पीटने की तरकीब निकाल ही ली। खैर बाजार का क्या दोष वो तो हर हाल में लाभ के सिद्धांत पर कायम है। गंगा का उफान उतना था नहीं जितना शोर मचा है। तमाम दावे है कई पूर्वती रिकॉर्ड ध्वस्त हुए है। बात राजधानी पटना के विस्तार और जिले की वस्तु स्थिति का आकलन ये है कि गंगा की भूमि पर कब्ज़ा कर उसके पाटो को भर गाँव मुहल्ला और ऊंची इमारते तामीर करने की ज़मीन हड़पु नीति बदस्तूर जारी है। वर्तमान दौर में भी भू माफिया गंगा के पाटो पर कब्ज़ा करने की लगातार कोशिश कर रहा है। चुकी ये गंगा के ही रास्ते और बहाव के विस्तृत मार्ग का हिस्सा है, वही पानी भरा था। पानी वही भरा और दियारा क्षेत्र का हाल क्या बताये आप पाठक गण परिचित ही है। तो लब्बोलुआब ये है कि “बाढ़ और बाज़ार” रिश्ते बड़े पुराने है फायदेमंद रिश्ते वैसे भी लंबा साथ निभाते है।

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