समाज में दम तोड़ती मानवता को पुनः ब्रह्मज्ञान द्वारा ही जीवन दान मिल सकता है

समाज में दम तोड़ती मानवता को पुनः ब्रह्मज्ञान द्वारा ही जीवन दान मिल सकता है

3 (1)

6

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिव्य धम आश्रम, दिल्ली में श्री गुरु पूर्णिमा महोत्सव बड़ी धूमधम से मनाया गया। इस भव्य अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण सम्मिलित हुए। गुरु पूर्णिमा के इस कार्यक्रम में संस्थान के प्रचारकों व साधवियों द्वारा इस अवसर पर सत्संग प्रवचन एवं भजन संकीर्तन प्रस्तुत किया गया।
समाज को श्रेष्ठ व्यक्ति सदैव से ही गुरुओं की देन रहे हैं। उपरोक्त विचार गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य कार्यक्रम में सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साधवी जी ने गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में भारी संख्या में उपस्थित भक्तों के समक्ष प्रस्तुत किए। प्रवचनों के माध्यम से साधवी जी ने बताया कि वर्षभर में अनेक पूर्णिमाऐं आती हैं- शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, वैशाख पूर्णिमा आदि पर आषाढ़ पूर्णिमा भक्ति व ज्ञान के पथ पर चल रहे साध्कों के लिए एक विशेष महत्व रखती है। इस दिन आकाश में अल्ट्रावायलेट रेडिएशन फैल जाती है। इस कारण व्यक्ति का शरीर व मन एक विशेष स्थिति में आ जाता है। उसकी भूख, नींद व मन का बिखराव कम हो जाता है। अतः यह स्थिति साधक के लिए बेहद लाभदायक है। कार्यक्रम में उपस्थित अपार जनसमूह को संबोधित करते हुए सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी जी ने कहा कि वेद व्यास जी ने 18 पुराणों की रचना की लेकिन इतना सब होने के बावजूद वे अशांत थे।
नारद जी ने उनसे अशांत होने का कारण पूछा तो वेद व्यास जी ने कहा कि मैं उस परमात्मा को परम तत्व से नहीं जान पाया। तब नारद जी ने उनको दीक्षा प्रदान की जिसका वास्तविक अर्थ है परम शांति से जूड़ जाना, परमात्मा का साक्षात्कार करना। परमात्मा को जानने के लिए एक गुरु की आवश्यकता होती है। जिसके द्वारा वास्तविक स्वरूप का बोध् होता है। इसी कारण हमारे समस्त धर्मिक शास्त्रा गुरु की महिमा का गुणगान कर रहे हैं। गुरु पूर्णिमा पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, इसी दिन वेद व्यास जी का जन्म हुआ था और इसी दिन वह दीक्षित हुए थे। इसलिए इस दिवस को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। पूजा के विषय में बताते हुए उन्होंने कहा कि संसार पूजा तो कर रहा है लकिन विधि के बारे में उसे ज्ञान नहीं। जो गुरुमुख होता है भाव जिसकी अंतकृष्ट खुल चुकी है, केवल वही पूजा की विध् को जानता है और उसकी पूजा ही श्रेष् और सफल है। मनुष्य को उवमुखी बनाने वाला एकमात्रा गुरु ही है। जिसके द्वारा वह ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर अपने जीवन को ज्योतिर्मय कर सकता है। हमारे समस्त शास्त्रों में इसीलिए गुरु महिमा का वर्णन है। गुरु को ब्रह्म, विष्णु और शंकर कहा गया है। इसके पीछे आध्यात्मिक रहस्य यही है कि गुरु एक शिष्य को ब्रह्मज्ञान प्रदान कर द्विज बनाता है। भाव कि उसे दोबारा जन्म देता है। पिफर शिष्य अंतर्जगत में प्रवेश करता है। जब तक द्विज नहीं तब तक परमात्मा के घर में प्रवेश नहीं है। जिस कारण गुरु ब्रह्म है। पिफर गुरु उस शिष्य की पग पग पर रक्षा करता है और उसका पोषण करता है जिस कारण गुरु विष्णु है। शिष्य के दुर्विचारों और दुर्गुणों का संहार करने वाला गुरु ही महेश अर्थात् शंकर है। इसीलिए धर्मिक ग्रंथों का यही उद्घोष है कि केवल मात्रा उसी गुरु को नमस्कार करना चाहिए तो ब्रह्मा, विष्णु और शिव के रूप में हैं। इसी कारण हमारे समस्त धर्मिक गं्रथ गुरु की महिमा का गुणगान कर रहे हैं। गुरु अपने शिष्य को ज्ञान का बोध् करवाता है और केवल ज्ञान से ही मुक्ति संभव है। इसलिए हमारे शास्त्रों में गुरु के विषय में यह वर्णित है कि गुरु ही परम धर्म है और परम गति भी।
सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी जी ने अपने विचारों में कहा कि भौतिक जगत में अनेकों प्रयास किए गए, विज्ञान ने भी अनेकों प्रकार के अनुसंधन किए ताकि विश्व में शांति स्थापित हो सके परन्तु उनके सभी प्रयास विपफल रहे। शांति का स्त्रोत तो केवल ब्रह्मज्ञान ही है। आज समाज में आतंकवाद, अनैतिकता, संकुचित भावना, संकीर्णता, अमानवीय व्यवहार जोरों से बढ़ रहा है। बहुत से लोग इस दुर्भावना को बढ़ा रहे हैं। इसलिए समाज को बदलने के लिए व्यक्ति में परिवर्तन लाना होगा जो कि केवल ब्रह्मज्ञान द्वारा ही संभव है। इसलिए आज के इस समाज में दम तोड़ती मानवता को पुनः ब्रह्मज्ञान के द्वारा ही जीवन दान मिल सकता है और दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान व्यक्ति में नई चेतना प्रस्फुटित कर व्यक्ति, समाज और फिर विश्व में शांति के लक्ष्य को लेकर कार्यरत है।
आत्म उत्थान व कल्याण के लिए गुरु पूर्णिमा का दिन वैज्ञानिक दृकृष्टकोण से अधिक उत्तम है। गुरु की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि नरेन्द्र से स्वामी विवेकानंद, मुकंद से स्वामी योगानंद परमहंस का सपफर एक गुरु के माध्यम से ही संभव हो पाया। वे भी युवा थे लेकिन उन्होंने नशे का चुनाव नहीं भक्ति का चुनाव किया इसलिए युवाओं को भी अपने भीतर छिपी शक्तियों को उजागर करना होगा। कार्यक्रम के दौरान साध्वी बहनों व भाइयों द्वारा सुमर भजनों का गायन भी किया गया।

Share This Post

Post Comment